दिनांक 13 मई 2025 के माध्यम से जारी करने की अनुशंसा की गई। यह किस्म आनंद-2 × वीविल चेक के संकरण से विकसित की गई जनसंख्या आधारित किस्म है।
यह एक शाकीय बहुवर्षीय तथा अत्यधिक पौष्टिक चारा दलहनी फसल है, जिसे सिंचित परिस्थितियों में उगाया जाता है। इसकी ऊँचाई लगभग 85-90 सेंटीमीटर होती है। इसके पत्ते हल्के गहरे हरे रंग के, छोटे, सीधे तथा किनारों पर दाँतेदार होते हैं। इसके फूल हल्के से मध्यम गहरे बैंगनी रंग के तथा बीज पीले और मध्यम आकार के होते हैं। इसका प्रसार बीज द्वारा किया जाता है। यह प्रति वर्ष 85-90 टन प्रति हेक्टेयर हरा चारा उत्पादन तथा 10-15 टन प्रति हेक्टेयर शुष्क पदार्थ उत्पादन देती है।
इस किस्म में 2.5-3.0 टन प्रति हैक्टर कच्चा प्रोटीन उत्पादन (सीपीवाई) तथा 1.0-1.5 क्विंटल प्रति हैक्टर बीज उत्पादन दर्ज किया गया है। इसमें 16-18 प्रतिशत कच्चा प्रोटीन तथा 58-62 प्रतिशत इन-विट्रो शुष्क पदार्थ पाचन क्षमता (आईवीडीएमडी) पाई जाती है। इसके अतिरिक्त इसमें 35-40 प्रतिशत अम्ल डिटर्जेंट फाइबर (एडीएफ) तथा 55-60 प्रतिशत न्यूट्रल डिटर्जेंट फाइबर (एनडीएफ) पाया जाता है, जो इसकी बेहतर पाचन क्षमता और पशुओं द्वारा स्वैच्छिक सेवन के लिए उपयुक्त माना जाता है। यह किस्म रतुआ रोग और लीफ माइनर के प्रति प्रतिरोधी तथा वीविल एवं हेलिकोवर्पा आर्मिजेरा के प्रति मध्यम प्रतिरोधी है।

इस किस्म की व्यावसायिक उपयोगिता इसकी बहुवर्षीय प्रकृति में निहित है, जिसके कारण इसे चारे तथा बीज दोनों उद्देश्यों के लिए उगाया जा सकता है। इसे “चारा फसलों की रानी” कहा जाता है, क्योंकि यह अत्यधिक पौष्टिक होती है तथा इसमें उच्च कच्चा प्रोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम जैसे खनिज एवं विटामिन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यदि इसे लूसर्न के कुल खेती क्षेत्र के 25 प्रतिशत भाग में भी अपनाया जाए, तो लगभग 20 लाख टन हरे चारे का उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
इसके सूखे पत्तों का उपयोग लीफ मील के रूप में पशुओं को खिलाने में किया जा सकता है। इसकी उच्च स्वादिष्टता के कारण चारे एवं लीफ मील के रूप में इसकी स्वीकार्यता अधिक है। औषधीय दृष्टि से इसका उपयोग फार्मा उद्योग में रेचक (Laxative) तैयार करने में संभावित रूप से किया जा सकता है। यह पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार, गर्भधारण दर में वृद्धि तथा दूध उत्पादन और वसा प्रतिशत बढ़ाने में सहायक है, जिससे दुग्ध उत्पादकों की आय में वृद्धि होती है। यह मधुमक्खी पालन (एपियरी) के लिए भी उपयुक्त है।
(स्रोत: भाकृअनुप-भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झाँसी)







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