17 जुलाई, 2026, नई दिल्ली
भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली ने "वन प्लैनेट, वन हेल्थ: बायोहैप्पीनेस और एक सतत भविष्य" विषय पर 33वें डॉ. बी.पी. पाल स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया। यह स्मृति व्याख्यान चेन्नई स्थित एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (एमएसएसआरएफ) की अध्यक्ष डॉ. सौम्या स्वामीनाथन द्वारा दिया गया। इस अवसर पर डॉ. एम.एल. जाट, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेयर) के सचिव तथा भाकृअनुप के महानिदेशक की गरिमामयी उपस्थिति रही।
गणमान्य अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए डॉ. अनुपमा सिंह, संयुक्त निदेशक (शिक्षा) एवं डीन, भाकृअनुप-आईएआरआई, नई दिल्ली ने डॉ. बी.पी. पाल स्मृति व्याख्यान के राष्ट्रीय एवं वैश्विक महत्व के विषयों पर वैज्ञानिक संवाद को बढ़ावा देने में इसकी भूमिका को रेखांकित किया।
अध्यक्ष का परिचय कराते हुए डॉ. चेरुकमल्ली श्रीनिवास राव, निदेशक, भाकृअनुप-आईएआरआई, ने डॉ. एम.एल. जाट के नेतृत्व में भाकृअनुप द्वारा शुरू की गई कई परिवर्तनकारी पहलों की सराहना की, जिनमें आईसीएमआर के सहयोग से संचालित ‘सेहत’ पहल, सीएसआर कॉन्क्लेव, राज्य-विशिष्ट कृषि रोडमैप का विकास तथा कृषि क्षेत्र की उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए मांग-आधारित कृषि अनुसंधान पर बल शामिल हैं।
वक्ता का परिचय कराते हुए डॉ. एम.एल. जाट ने वैश्विक जनस्वास्थ्य, पोषण, जैव विविधता संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में डॉ. सौम्या स्वामीनाथन के विशिष्ट योगदानों को रेखांकित किया। उन्होंने क्षय रोग (टीबी) मुक्त विश्व की परिकल्पना को आगे बढ़ाने में उनके नेतृत्व की सराहना की तथा विज्ञान-आधारित, समुदाय-केन्द्रित हस्तक्षेपों के माध्यम से वंचित समुदायों को सशक्त बनाने में एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन के अग्रणी कार्यों की प्रशंसा की।

स्मृति व्याख्यान देते हुए डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने भाकृअनुप-आईएआरआई से जुड़ी अपनी बचपन की स्मृतियों, डॉ. बी.पी. पाल के प्रेरणादायी व्यक्तित्व तथा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के संस्थान भ्रमण को याद किया।
विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि वैश्विक स्वास्थ्य में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद उभरती पर्यावरणीय, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के कारण विश्व सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की प्राप्ति की दिशा में निर्धारित मार्ग से पीछे चल रहा है। उन्होंने कहा कि जैव विविधता में कमी, परागण करने वाले जीवों की घटती संख्या, मृदा की पोषण गुणवत्ता में गिरावट, जलवायु परिवर्तन तथा बढ़ते ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण खाद्य एवं पोषण सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
डॉ. स्वामीनाथन ने कहा कि बच्चों में अवरुद्ध वृद्धि (Stunting) आज भी संज्ञानात्मक और शारीरिक विकास के लिए एक गंभीर चुनौती बनी हुई है तथा उन्होंने लचीली और पोषण-संवेदनशील खाद्य प्रणालियों के महत्व पर बल दिया।
स्वास्थ्य के पर्यावरणीय निर्धारकों पर चर्चा करते हुए उन्होंने वायु प्रदूषण, भूजल क्षरण, मृदा अवनयन तथा शहरी हरित क्षेत्रों में कमी को मानव कल्याण के लिए प्रमुख खतरे बताया। उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव महिलाओं पर असमान रूप से अधिक पड़ता है, जिससे समावेशी और सतत विकास की आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। डॉ. स्वामीनाथन ने पोषण और जलवायु सुरक्षा को सुदृढ़ करने में अल्प उपयोगित खाद्य प्रजातियों की संभावनाओं पर बल दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि आईसीएआर भारत की समृद्ध कृषि जैव विविधता का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण करने तथा साक्ष्य-आधारित संरक्षण, अनुसंधान और सतत विकास पहलों को समर्थन देने के लिए भारत का एक कृषि जैव विविधता मानचित्र तैयार करे।
‘वन प्लैनेट, वन हेल्थ’ दृष्टिकोण की वकालत करते हुए डॉ. स्वामीनाथन ने एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन की कई प्रभावशाली पहलों को प्रस्तुत किया, जिनमें मैंग्रोव संरक्षण, प्लास्टिक हटाने हेतु ‘वन सी ड्राइव’, जैव विविधता पुनर्स्थापन के लिए कृत्रिम रीफ, एकीकृत बहु-पोषण स्तर जलीय कृषि, मछुआरा महिलाओं का सशक्तिकरण तथा जनजातीय कृषक समुदायों द्वारा पारंपरिक बीज संरक्षण शामिल हैं। उन्होंने कहा कि एक लचीले भविष्य को सुरक्षित करने के लिए पारिस्थितिकीय स्थिरता को जनस्वास्थ्य और पोषण के साथ एकीकृत करना आवश्यक है।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डीएआरई के सचिव एवं आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट, सचिव (डेयर) एवं महानिदेशक (भाकृअनुप) ने डॉ. सौम्या स्वामीनाथन को रॉयल सोसायटी की फेलो चुने जाने पर बधाई दी और विज्ञान तथा वैश्विक जनस्वास्थ्य में उनके उत्कृष्ट योगदानों की सराहना की। उन्होंने भारतीय कृषि और कृषि अनुसंधान में डॉ. बी.पी. पाल के अग्रणी योगदानों को स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
डॉ. जाट ने कहा कि ग्रह स्वास्थ्य, मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन और पोषण सुरक्षा की चुनौतियों का समाधान करने के लिए जैव विविधता संरक्षण को सबसे प्रभावी साधनों में से एक बताया। ‘बायोहैप्पीनेस’ की अवधारणा पर बल देते हुए उन्होंने स्वस्थ और सतत जीवनशैली को बढ़ावा देने में इसके महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने भारत का कृषि जैव विविधता एटलस (Agrobiodiversity Atlas) विकसित करने तथा देश की समृद्ध कृषि जैव विविधता के संरक्षण हेतु पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को संरक्षित करने की आवश्यकता पर भी चर्चा की। दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन का आह्वान करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि “उपेक्षित फसलें” और “अल्प उपयोगित फसलें” जैसे शब्दों के स्थान पर “अवसर फसलें” (Opportunity Crops) शब्द का उपयोग किया जाना चाहिए, क्योंकि इनमें पोषण, जलवायु सहिष्णुता और सतत कृषि को बढ़ावा देने की अपार संभावनाएं निहित हैं।
(स्रोत: भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली)







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