कृषि ज्ञान

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के तहत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद एक स्वायत्तशासी संस्था है। रॉयल कमीशन की कृषि पर रिपोर्ट के अनुसरण में सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत और 16 जुलाई, 1929 को स्थापित इस सोसाइटी का पहले नाम इंपीरियल काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च था। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का मुख्यालय नई दिल्ली स्थित है।
भारत वर्ष में बागवानी, मात्स्यिकी और पशु विज्ञान सहित कृषि के क्षेत्र में समन्वयन, मार्गदर्शन और अनुसंधान प्रबन्धन एवं शिक्षा के लिए परिषद सर्वोच्च निकाय है। देश भर में फैले 97 भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थानों और 45 कृषि विश्वविद्यालयों सहित यह विश्व में सर्वाधिक विस्तृत राष्ट्रीय कृषि पद्धति है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने देश में हरित क्रांति लाने और उसके बाद कृषि में निरन्तर विकास में अपने अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास से अग्रणी भूमिका निभाई है। जिससे वर्ष 1950-51 से खाद्यान्न का उत्पादन 4 गुणा, बागवानी फसलें 6 गुणा, मत्स्य उत्पादन 9 गुणा (समुद्री 5 गुणा और अंतःस्थलीय 17 गुणा), दूध 6 गुणा और अंडा उत्पादन 27 गुणा बढ़ा है। राष्ट्रीय खाद्य और पोषण सुरक्षा पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है। कृषि में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्टता बढ़ाने में परिषद की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास में यह अद्यतन क्षेत्रों में संलग्न है और इसके वैज्ञानिक अपने क्षेत्रों में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हैं।

नींव के पत्थर
• वर्ष 1957 में मक्का पर पहली आखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना की शुरुआत।
• वर्ष 1958 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का समतुल्य कृषि विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया।
• वर्ष 1960 में पंतनगर में भूमि अनुदान पद्धति पर प्रथम राज्य कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना।
• वर्ष 1966 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तहत विभिन्न कृषि अनुसंधान संस्थानों की स्थापना।
• वर्ष 1973 में कृषि मंत्रालय के तहत कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (डेयर) की स्थापना।
• वर्ष 1974 में प्रथम कृषि विज्ञान केन्द्र, पुडुचेरी (पांडिचेरी) की शुरुआत।
• वर्ष 1975 में कृषि अनुसंधान सेवा और कृषि वैज्ञानिक भर्ती मंडल की स्थापना।
• वर्ष 1979 में प्रयोगशाला से खेत तक कार्यक्रम और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परियोजना (एन ए आर पी) की शुरुआत।
• वर्ष 1995 में संस्थान-ग्राम-संबंध कार्यक्रम की शुरुआत।
• वर्ष 1996 में राष्ट्रीय जीन बैंक की स्थापना।
• हरित क्रांति में अमूल्य योगदान देने के लिए भा.कृ.अनु.प. को किंग बोडोइन पुरुस्कार वर्ष 1989 में प्रदान किया गया। दोबारा वर्ष 2004 में धान-गेहूं कंर्सोटियम में भागीदारी के तहत अनुसंधान और विकास प्रयत्नों के लिए किंग बोडोइन पुरस्कार प्रदान किया गया।
• राष्ट्रीय कृषि प्रौद्योगिकी परियोजना (एन ए टी पी) वर्ष 1998 में और वर्ष 2005 में राष्ट्रीय कृषि नवोन्मेषी परियोजना (एन ए आई पी) की शुरुआत।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के प्रमुख लक्ष्य
• कृषि, कृषि वानिकी, पशुपालन, मछली पालन, गृह विज्ञान और संबंधित विज्ञानों में शिक्षा, अनुसंधान और उसके अनुप्रयोग के लिए योजना बनाना, क्रियान्वयन करना, सहायता देना, बढ़ावा देना और समन्वय करना।
• कृषि, पशुपालन, मछली पालन, गृह विज्ञान और संबंधित विज्ञानों पर आधारित अपने प्रकाशनों और सूचना प्रणाली के द्वारा मूल्यांकन और सामान्य सूचना का प्रचार-प्रसार करना तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम तैयार करना और बढ़ावा देना।
• कृषि, कृषि वानिकी, पशुपालन, मछली पालन, गृह विज्ञान और संबंधित विज्ञानों में शिक्षा, अनुसंधान, प्रशिक्षण और सूचनाओं के प्रचार-प्रसार के परामर्श सेवाएं देना, क्रियान्वयन करना और बढ़ावा देना।
• कृषि, कटाई के बाद की प्रौद्योगिकी और ग्रामीण विकास के व्यापक क्षेत्रों की समस्याओं पर ध्यान देना और इसके लिए अन्य संस्थाओं जैसे भारतीय समा‌जिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र और विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर सांझा कार्यक्रम तैयार करना।
• परिषद के लक्ष्यों को पाने के लिए आवश्यक अन्य कदम उठाना।

संगठन
• केन्द्रीय कृषि मंत्री भा.कृ.अनु.प. के पदेन अध्यक्ष हैं।
• सचिव, कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग, भारत सरकार एवं महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद प्रमुख कार्यकारी अधिकारी हैं।
• शासी निकाय ही नीति निर्माता है।
• कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल
• उप महानिदेशक (8)
• अतिरिक्त सचिव (डेयर) और सचिव (भा.कृ.अनु.प.)
• अतिरिक्त सचिव और वित्त सलाहकार
• सहायक महानिदेशक (24)
• राष्ट्रीय निदेशक, राष्ट्रीय कृषि नवोन्मेषी परियोजना
• कृषि सूचना एवं प्रकाशन निदेशालय

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थान, समतुल्य विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय
अनुसंधान केन्द्र, राष्ट्रीय ब्यूरो एवं निदेशालय/परियोजना निदेशालय

समतुल्य विश्वविद्यालय- 4
1. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली
2. राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान, करनाल
3. भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर
4. केन्द्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान, मुंबई

संस्थान- 45
1. केन्द्रीय धान अनुसंधान संस्थान, कटक
2. विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा
3. भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर
4. केन्द्रीय तम्बाकू अनुसंधान संस्थान, राजामुंद्री
5. भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ
6. गन्ना प्रजनन संस्थान, कोयम्बटूर
7. केन्द्रीय कपास संस्थान, नागपुर
8. केन्द्रीय जूट एवं संबद्ध रेशे अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर
9. भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झांसी
10. भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर
11. केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ
12. केन्द्रीय शीतोष्ण बागवानी संस्थान, श्रीनगर
13. केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर
14. भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी
15. केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला
16. केन्द्रीय कंदी फसलें अनुसंधान संस्थान, त्रिवेन्द्रम
17. केन्द्रीय रोपण फसलें अनुसंधान संस्थान, कासरगोड
18. केन्द्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पोर्ट ब्लेअर
19. भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान, कालीकट
20. केन्द्रीय मृदा और जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, देहरादून
21. भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल
22. केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल
23. पूर्वी क्षेत्र के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अनुसंधान परिसर, मखाना केन्द्र सहित, पटना
24. केन्द्रीय शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद
25. केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर
26. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अनुसंधान परिसर, गोवा
27. पूर्वोत्तर पहाड़ी क्षेत्रों के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अनुसंधान परिसर, बारापानी
28. राष्ट्रीय अजैविक दबाव प्रबन्धन संस्थान, मालेगांव, महाराष्ट्र
29. केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल
30. केन्द्रीय कटाई उपरांत अभियांत्रिकी और प्रौद्योगिकी संस्थान, लुधियाना
31. भारतीय प्राकृतिक रेज़िन और गोंद संस्थान, रांची
32. केन्द्रीय कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, मुंबई
33. राष्ट्रीय जूट एवं संबद्ध रेशे प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, कोलकाता
34. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली
35. केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान, मखदुम
36. केन्द्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान, हिसार
37. राष्ट्रीय पशु पोषण और कायिकी संस्थान, बेंगलौर
38. केन्द्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर
39. केन्द्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, कोच्चि
40. केन्द्रीय खारा जल जीवपालन अनुसंधान संस्थान, चैन्नई
41. केन्द्रीय अंतः स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर
42. केन्द्रीय मात्स्यिकी प्रौद्योगिकी संस्थान, कोच्चि
43. केन्द्रीय ताजा जल जीव पालन संस्थान, भुवनेश्वर
44. राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान एवं प्रबन्धन अकादमी, हैदराबाद

राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र- 17
1. राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्यौगिकी अनुसंधान केन्द्र, नई दिल्ली
2. राष्ट्रीय समन्वित कीट प्रबन्धन केन्द्र, नई दिल्ली
3. राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र, मुजफ्फरपुर
4. राष्ट्रीय नीबू वर्गीय अनुसंधान केन्द्र, नागपुर
5. राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केन्द्र, पुणे
6. राष्ट्रीय केला अनुसंधान केन्द्र, त्रिची
7. राष्ट्रीय बीज मसाला अनुसंधान केन्द्र, अजमेर
8. राष्ट्रीय अनार अनुसंधान केन्द्र, शोलापुर
9. राष्ट्रीय आर्किड अनुसंधान केन्द्र, पेकयांग, सिक्किम
10. राष्ट्रीय कृषि वानिकी अनुसंधान केन्द्र, झांसी
11. राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर
12. राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र, हिसार
13. राष्ट्रीय मांस अनुसंधान केन्द्र, हैदराबाद
14. राष्ट्रीय शूकर अनुसंधान केन्द्र, गुवाहाटी
15. राष्ट्रीय याक अनुसंधान केन्द्र, वेस्ट केमंग
16. राष्ट्रीय मिथुन अनुसंधान केन्द्र, मेदजीफेमा, नगालैंड
17. राष्ट्रीय कृषि अर्थशास्त्र और नीति अनुसंधान केन्द्र, नई दिल्ली

राष्ट्रीय ब्यूरो 6
1. राष्ट्रीय पादप आनुवंशिकी ब्यूरो, नई दिल्ली
2. राष्ट्रीय कृषि के लिए महत्वपूर्ण सूक्ष्म जीव ब्यूरो, मऊ, उत्तर प्रदेश
3. राष्ट्रीय कृषि के लिए उपयोगी कीट ब्यूरो, बेंगलौर
4. राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण और भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो, नागपुर
5. राष्ट्रीय पशु आनुवंशिकी संसाधन ब्यूरो, करनाल
6. राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिकी संसाधन ब्यूरो, लखनऊ

निदेशालय/प्रायोजना निदेशालय- 25
1. मक्का अनुसंधान निदेशालय, नई दिल्ली
2. धान अनुसंधान निदेशालय, हैदराबाद
3. गेहूँ अनुसंधान निदेशालय, करनाल
4. तिलहन अनुसंधान निदेशालय, हैदराबाद
5. बीज अनुसंधान निदेशालय, मऊ
6. ज्वार अनुसंधान निदेशालय, हैदराबाद
7. मूंगफली अनुसंधान निदेशालय, जूनागढ़
8. सोयाबीन अनुसंधान निदेशालय, इंदौर
9. तोरिया और सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर
10. मशरूम अनुसंधान निदेशालय, सोलन
11. प्याज एवं लहसुन अनुसंधान निदेशालय, पुणे
12. काजू अनुसंधान निदेशालय, पुत्तुर
13. तेलताड़ अनुसंधान निदेशालय, पेडावेगी, पश्चिम गोदावरी
14. औषधीय एवं सगंधीय पादप अनुसंधान निदेशालय, आणंद
15. पुष्पोत्पादन अनुसंधान निदेशालय, नई दिल्ली
16. कृषि पद्धतियां अनुसंधान प्रयोजना निदेशालय, मोदीपुरम
17. जल प्रबन्धन अनुसंधान निदेशालय, भुवनेश्वर
18. खरपतवार विज्ञान अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर
19. गोपशु प्रायोजना निदेशालय, मेरठ
20. खुर एवं मुंहपका रोग प्रायोजना निदेशालय, मुक्तेश्वर
21. कुक्कुट पालन प्रायोजना निदेशालय, हैदराबाद
22. पशु रोग निगरानी एवं जीवितता प्रयोजना निदेशालय, हैब्बल, बेंगलूर
23. कृषि सूचना एवं प्रकाशन निदेशालय (दीपा), नई दिल्ली
24. शीत जल मात्स्यिकी अनुसंधान निदेशालय, भीमताल, नैनीताल
25. कृषक महिला अनुसंधान निदेशालय, भुवनेश्वर

अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान प्रायोजनाएं-61
1. कीटनाशी अवशेष, नई दिल्ली
2. सूत्रकृमि, नई दिल्ली
3. मक्का, नई दिल्ली
4. धान, हैदराबाद
5. चना, कानपुर
6. मूलार्प, कानपुर
7. अरहर, कानपुर
8. मरू फलीदार फसलें, जोधपुर
9. गेहूँ एवं जौ सुधार प्रायोजना, करनाल
10. ज्वार, हैदराबाद
11. बाजरा, जोधपुर
12. गौण अनाज, बेंगलूर
13. गन्ना, लखनऊ
14. कपास, कोयम्बटूर
15. मूंगफली, जूनागढ़
16. सोयाबीन, इंदौर
17. तोरिया और सरसों, भरतपुर
18. सूरजमुखी, कुसुम, अरण्डी, हैदराबाद
19. अलसी, कानपुर
20. तिल और रामतिल, जबलपुर
21. जैविक नियंत्रण, बेंगलूर
22. मधुमक्खी अनुसंधान प्रशिक्षण, हिसार
23. एन एस पी (फसलें), मऊ
24. चारा फसलें, झांसी
25. उष्ण कटिबंधी फल, बेंगलूर
26. उपोष्ण कटिबंधी फल, लखनऊ
27. शुष्क क्षेत्रीय फल, बीकानेर
28. मशरूम, सोलन
29. सब्जी (एन एस पी सहित) वाराणसी
30. आलू, शिमला
31. कंदीय फसलें, तिरूवनंतपुरम
32. तेलताड़, कासरगोड़
33. काजू, पुत्तुर
34. मसाले, कालीकट
35. औषधीय और संगधीय पौधे पान सहित, आणंद
36. पुष्पोत्पादन, नई दिल्ली
37. मृदा और पौधों में सूक्ष्म गौण और प्रदूषक तत्व, भोपाल
38. मृदा परीक्षण और फसल प्रतिक्रिया, भोपाल
39. दीर्घावधि उर्वरक परीक्षण, भोपाल
40. लवण प्रभावित मृदाएं और कृषि में लवणीय जल उपयोग, करनाल
41. जल प्रबन्धन अनुसंधान, भुवनेश्वर
42. भू जल उपयोग, भुवनेश्वर
43. शुष्क भूमि खेती, हैदराबाद
44. कृषि मौसम विज्ञान (जलवायु परिवर्तन के प्रति भारतीय कृषि पर प्रभाव अनूकुलता नेटवर्क सहित) हैदराबाद
45. समन्वय कृषि पद्धति अनुसंधान (जैविक खेती नेटवर्क सहित) मोदीपुरम
46. खरपतपवार नियंत्रण, जबलपुर
47. कृषि वानिकी, झांसी
48. एफ आई एम, भोपाल
49. कृषि में श्रम दक्षता (एरगोनोमिक्स) और सुरक्षा
50. कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों हेतु ऊर्जा के पुनर्नवीकरण स्रोत, भोपाल
51. पशु ऊर्जा उपयोग, भोपाल
52. कृषि में प्लास्टिक उपयोग, लुधियाना
53. फसल कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी, लुधियाना
54. बकरी सुधार, मथुरा
55. पशु उत्पादन में सुधार के लिए खाद्य संसाधनों में सुधार एवं पोषण उपयोग, बेंगलूर
56. पशु अनुसंधान, मेरठ
57. कुक्कुट, हैदराबाद
58. शूकर, इज्जतनगर
59. खुरपका और मुंहपका रोग, मुक्तेश्वर
60. ए डी एम ए एस, बैंगलूर
61. गृह विज्ञान, भुवनेश्वर

नेटवर्क प्रायोजनाएं- 17
1. अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान नेटवर्क अल्पदोहित फसलें, नई दिल्ली
2. अखिल भारतीय तम्बाकू नेटवर्क प्रायोजना, राजामुन्द्री
3. श्वेत सूंडी और अन्य मृदा एंथ्रोपोड नेटवर्क प्रायोजना, दुर्गापुर
4. कृषि मौसम विज्ञान, नेटवर्क, बेंगलूर
5. आर्थिकी पक्षी विज्ञान नेटवर्क, हैदराबाद
6. अखिल भारतीय नेटवर्क प्रायोजना, कृंतक नियंत्रण, जोधपुर
7. अखिल भारतीय नेटवर्क प्रायोजना, जूट एवं संबद्ध रेशे, बैरकपुर
8. प्याज एवं लहसुन सुधार नेटवर्क प्रायोजना, पुणे
9. जैव उर्वरक नेटवर्क, भोपाल
10. प्राकृतिक रेजिन और गोंद में कटाई, कटाई उपरांत और मूल्य संवर्धन नेटवर्क प्रायोजना,
11. पशु आनुवंशिक संसाधन नेटवर्क प्रायोजना, करनाल
12. देशी दुग्ध उत्पादों के औद्योगिक उपयोग हेतु प्रशोधन सुधार के लिए अनुसंधान एवं विकास समर्थन नेटवर्क प्रायोजना
13. भेड़ सुधार नेटवर्क प्रायोजना, अविकानगर
14. भैंस सुधार नेटवर्क प्रायोजना, हिसार
15. जठर-आंत्रीय परजीवी नेटवर्क, इज्जतनगर
16. हैमोरहेजिक सेप्टिसीमिया नेटवर्क, इज्जतनगर
17. ब्लूटंग रोग नेटवर्क कार्यक्रम, इज्जतनगर

अन्य प्रायोजनाएं-10
1. कपास प्रौद्योगिकी मिशन (सी आई सी आर, नागपुर)
2. जूट प्रौद्योगिकी मिशन (सी आर आई जे ए एफ, बैरकपुर)
3. कृषि विज्ञान केन्द्रों की निरन्तरता, सुदृढ़ीकरण और स्थापना
4. भारत में उच्च कृषि शिक्षा का सुदृढ़ीकरण और विकास, नई दिल्ली
5. केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इम्फाल
6. भा.कृ.अनु.प. मुख्यालय का सुदृढ़ीकरण और आधुनिकीकरण
7. कृषि प्रौद्योगिकी का बौद्धिक सम्पदा प्रबन्धन एवं हस्तांतरण/व्यावसायिकरण (मौजूदा घटक आई पी आर मुख्यालय का विकास)
8. भारत-अमेरीकी ज्ञान पहल
9. राष्ट्रीय कृषि नवोन्मेषी प्रायोजना, नई दिल्ली
10. मूलभूत और नीतिगत अनुसंधान हेतु राष्ट्रीय निधि, नई दिल्ली

संपर्क सूत्र

डॉ. एस. अय्यप्पन
महानिदेशक
कृषि भवन, नई दिल्ली 110 114
फोनः (कार्यालय) 91-11-23382629,91-11-23386711
फैक्सः 91-11-23384773
ई-मेलः dg.icar@nic.in,ayyappans@icar.org.in

श्री राजीव महर्षि
सचिव (भा.कृ.अनु.प.)
कृषि भवन, नई दिल्ली 110 114
फोनः (कार्यालय) 91-11-23384450
फैक्सः 91-11-23387293
ई-मेलः secy.icar@nic.in

श्री चमन कुमार
वित्त सलाहकार (भा.कृ.अनु.प.)
कृषि भवन, नई दिल्ली 110 114
फोनः (कार्यालय) 91-11-23384360
फैक्सः 91-11-23389388

डा. सी.डी. मायी
अध्यक्ष (कृ.वै.च.मं.)
पहली मंजिल, कृषि अनुसंधान भवन-I,
पूसा, नई दिल्ली 110 012
फोनः 91-11-25843295 एक्स 301
फैक्सः 91-11-25846540
ई-मेलः cdmayee@icar.org.in

डा. स्वपन कुमार दत्ता
उप महानिदेशक (फसल विज्ञान)
फसल विज्ञान संभाग, कृषि भवन, नई दिल्ली 110 114
फोनः (कार्यालय) 91-11-23382545
फैक्सः 91-11-23097003
ई-मेलः ddgcs.icar@nic.in

डा. स्वपन कुमार दत्ता
उपमहानिदेशक (पशु विज्ञान)/अतिरिक्त भार
पशु विज्ञान संभाग, कृषि भवन
नई दिल्ली 110 114
फोनः 91-11-23381119, 91-11-23388991 एक्स 200
फैक्सः 91-11-23097001
ई-मेलः ddgcs.icar@nic.in

डा. अरविंद कुमार
उप महानिदेशक (शिक्षा)
शिक्षा संभाग, कृषि अनुसंधान भवन-II, नई दिल्ली- 110 012
फोनः (कार्यालय) 91-11-25841760
फैक्सः 91-11-25843932
ई-मेलः ddgedn@icar.org.in

डा. अरविन्द कुमार
उपमहानिदेशक (मात्स्यिकी) अतिरिक्त भार
मात्स्यिकी संभाग, कृषि अनुसंधान भवन-II, नई दिल्ली-110 012
फोनः (कार्यालय) 91-11-25846738, 91-11-25842284/85/62/79/71 एक्स 1309
फैक्सः 91-11-25841955
ई-मेलः ddgedn@icar.org.in

डा. एच.पी. सिंह
उपमहानिदेशक (बागवानी)
बागवानी संभाग, कृषि अनुसंधान भवन-II, नई दिल्ली-110 012
फोनः (कार्यालय) 91-11-25851068, 91-11-25842284/85/62/70/71 एक्स 1422
ई-मेलः hpsingh@icar.org.in

डा. के डी कोकाटे
उपमहानिदेशक (कृषि विस्तार)
कृषि विस्तार संभाग, कृषि अनुसंधान भवन, नई दिल्ली- 110 012
फोनः 91-11-25843277
फैक्सः 91-11-25842968
ई-मेलः kdkokate@icar.org.in

डा. ए.के. सिंह
उप महानिदेशक (प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन)
प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन संभाग,
कृषि अनुसंधान भवन-II, नई दिल्ली 110 012
फोनः (कार्यालय) 91-11-25848364, 91-11-25848366, 91-11-25842285 एक्स 1101
ई मेलः aksingh@icarl.org.on, aks-wtc@yahoo.com, aksingh.icar@gmail.com

डा. एम.एम. पांडे
उप महानिदेशक (कृषि अभियांत्रिकी)
कृषि अभियांत्रिकी संभाग, कृषि अनुसंधान भवन-II
नई दिल्ली- 110 012
फोनः 91-11-25843415
फैक्सः 91-11-25842660
ई-मेलः mmpandey@icar.org.in

डा. एम.एम. पांडे
राष्ट्रीय निदेशक (एन ए आई पी)/अतिरिक्त भार
कमरा न. 513, कृषि अनुसंधान भवन-II, पूसा कैम्पस, नई दिल्ली 110 012
फोन-91-11-25848772
फैक्सः 91-11-25843403
ई-मेलः ndnaip@icar.org.in
वेबसाइटः www.naip.icar.org.in

डा. टी.पी. त्रिवेदी
परियोजना निदेशक (दीपा)
पांचवीं मंजिल, कृषि अनुसंधान भवन-1, पूसा, नई दिल्ली 110 012
फोनः 91-11-25842787
फैक्सः 91-11-25843285
ई-मेलः tptrivedi@icar.org.in

पी ए बी एक्स एक्सचेंज नम्बर
कृषि भवनः
91-11-23388991-9, 91-11-23388950-60

कृषि अनुसंधान भवन-I
91-11-25842906, 91-11-25841960, 91-11-25841993, 91-11-25842828, 91-11-25842168, 91-11-25842221

कृषि अनुसंधान भवन-II
91-11-25842262, 91-11-25842270, 91-11-25841284, 91-11-25842285, 91-11-25842271, 91-11-25842405, 91-11-25841430, 91-11-25843435

जन संपर्क अधिकारी
श्री अनिल के शर्मा
फोन 91-11-23388842
ई-मेलः anil.cpro@gmail.com

फसल विज्ञान विभाग
भारतीय कृषि में प्रौद्योगिकी आधारित विकास के लिए भारत के महान कृषकों को उनके अमूल्य योगदान और सहयोग के लिए शत-शत प्रणाम। देश में फसल विज्ञान संभाग ने 1960-70 के दशक में हरित क्रांति और 1980-90 के दशक में पीली क्रांति लाने में प्रमुख भूमिका निभाई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अग्रणी है और फसल विज्ञान संभाग इन सब गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र है।
संस्थान में एक समतुल्य विश्वविद्यालय सहित 13 राष्ट्रीय संस्थान, 3 ब्यूरो, 9 परियोजना निदेशालय, 2 राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र, 27 अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान प्रायोजनाएं और 5 अखिल भारतीय नेटवर्क प्रायोजनाएं हैं। इसके अलावा कई रिवोल्विंग फंड स्कीमें और राष्ट्रीय अनुसंधान नेटवर्क हैं और बाहरी वित्तपोषित प्रायोजनाओं को यहां तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद मुख्यालय स्थित इस संभाग में छः विषय विशेषज्ञ तकनीकी अनुभाग हैं- (1) खाद्य एवं चारा फसलें (2) तिलहन एवं दलहन (3) व्यावसायिक फसलें (4) बीज (5) पादप सुरक्षा और (6) बौद्धिक संपदा अधिकार।
प्रत्येक अनुभाग के अध्यक्ष सहायक महानिदेशक हैं। विभिन्न वैज्ञानिक/तकनीकी मामलों को 3 प्रमुख वैज्ञानिक मध्यम स्तर प्रबन्धन में सहयोग देते हैं जबकि एक अवर सचिव (फसल विज्ञान) संभाग में अदरूनी प्रशासन के लिए उत्तरदायी है।

महत्वपूर्ण क्षेत्र
• पारम्परिक और आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान का समन्वयन, औजार और विभिन्न कृषि पारिस्थितिकी और स्थितियों के अनुकूल उन्नत फसल किस्मों/संकरों के विकास के लिए विज्ञान की अद्यतन तकनीकें और दक्ष आर्थिक रूप से अनुकूल पर्यावरण हितैषी और टिकाऊ कृषि उत्पादन और सुरक्षा प्रौद्योगिकियां; मूलभूत, राजनीतिपूर्ण और आगामी फसल विज्ञान अनुसंधान को प्रोत्साहन देना।
• बीज उत्पादन प्रौद्योगिकी में सुधार और संकर किस्मों पर ज्यादा ध्यान देते हुए प्रजनन बीज का उत्पादन।
• पादप, कीट और अन्य प्राणियों और कृषि में महत्वपूर्ण सूक्ष्मजीवों के आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण और टिकाऊ उपयोग।
• फसल विज्ञान में रान-सघन परामर्श और परामर्शदात्री सेवाएं प्रदान करना।

उपलब्धियां
• विभिन्न कृषि परिस्थितियों के लिए लगभग 3,300 उच्च उत्पादक किस्मों/संकरों का विकास करके इन्हें जारी किया गया। अखिल भारतीय समन्वित परियोजनाओं के देश भर में फैले नेटवर्क के तहत प्रौद्योगिकियों की पहचान की सुविधा प्रदान करना; वर्ष 1960 के मध्य से लेकर वर्ष 1990 के मध्य तक हरित और पीत क्रांति में ये परिणाम प्राप्त हुए; वर्ष 1950-51 से अब तक और तोरिया-सरसों के क्षेत्र में राष्ट्रीय औसत उत्पादकता बढ़कर 2-4 गुणा हो गई।
• वर्ष 1970 में बाजरा और कपास में पहली बार विश्व में संकर किस्मों का विकास किया और अन्य फसलों में भी संकर किस्मों का विकास किया गया। इनमें गैर परम्परागत फसलों जैसे अलसी, कुसुम, धान, अरहर और तोरिया सरसों शामिल हैं। अधिक उत्पादन के साथ ही उच्च पोषण मान के लिए क्वालिटी प्रोटीन मक्का (क्यू पी एम) और बेबी कार्न में एकल क्रॉस संकर का विकास किया गया।
• कई फसलों में जंगली प्रजातियों से दबाव सहिष्णुता और गुणवत्ता के जीन लिये गये; दलहन और अन्य फसलों के लिए नये क्षेत्रों और फसल पद्धतियों के लिए अगेती और उपयुक्त पादप किस्मों का विकास किया गया; कई फसलों में संकर विकास के लिए प्रभावी नर बंध्यता पद्धति का विकास किया गया।
• पहली बार ‘पूसा बासमती’ की आनुवंशिक पृष्ठभूमि में आणुविक चिन्ह्क सहायता प्राप्त चयन/पिरामिड और आई आर बी बी 55 के बैकक्रॉस हस्तांतरण xa13 और xa 21 को जीन का सफल प्रयोग किया गया; इस तरह विषाणु झुलसा प्रतिरोधी किस्म ‘उन्नत पूसा बासमती’ का विकास हुआ।
• देशी किस्म ‘बीकानेरी नरमा’ के प्रयोग से बॉलवर्म प्रतिरोधी बी टी कपास का विकास किया गया; बी टी कपास और गैर बी टी कपास की जांच के लिए रेडी टू यूज़ नैदानिक किट का विकास किया गया। सरसों में नर बंध्यक जीन की पहचान करके उसे विलगित किया गया, यह अन्य फसलों में संकर विकास में उपयोगी है फर्टिलिटी रेस्टोरर जीन के लिए एस सी ए आर मार्कर का विकास किया गया।
• झुलसा रोग प्रतिरोधी जीन ‘Pi-Kh’ क्लोन तैयार करके लक्षणवर्णन किया गया और ट्रांसजीनी धान में इसे वैधता प्रदान की गयी।
• नये एराबीडोप्सिस जनित प्रोमोटर की पहचान की गयी। ट्रांसजीनी पौधों में ये विजातीय जीन के गुणों को दर्शाते हैं।
• सूखा सहिष्णु गेहूं किस्म सी 306 से सूखा दबाव उत्तरदायी ट्रांसक्रिप्शन कारक ‘टी ए सी बी एफ एस’ और ‘टी ए सी बी एफ 9’ को विलगित करके क्लोन तैयार किये गये।
• प्रमुख विश्वस्तरीय प्रयत्नों के परिणामस्वरूप धान में क्रोमोसोम 11 की दीर्घ भुजा के 6.7 मिलियन आधारभूत युग्मों को क्रमानुसार किया गया।
• 33 प्रमुख फसलों में डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग की गयी और 2215 फिंगर प्रिंट किस्मों को जारी किया गया।
• एन बी पी जी आर, नई दिल्ली में फसलों और उनकी जंगली प्रजातियों के 3,46,000 जननद्रव्य प्रविष्टियों का संरक्षण किया गया। एन बी ए आई एम, मऊ में 2517 सूक्ष्मजीव संवर्धन (394 जीवाणु, 2077 फफूंदी, 36 एक्टिनोमाइसिट्स और 10 खमीर प्रवष्टियां) किये गये। भा.कृ.अनु.सं., नई दिल्ली में 175,000 से ज्यादा कीट प्रजातियों का डिजिटल डाटाबेस तैयार किया गया।
• एन बी पी जी आर, नई दिल्ली में क्षमतावान मूल्यवान पादप जर्मप्लाज्म के पंजीकरण और डाक्यूमेंट की प्रणाली तैयार की गयी। 77 पादप प्रजातियों की 482 प्रविष्टियों का पंजीकरण किया गया।
• विभिन्न फसलों में सेमीलूपर कैटरपिल्लर के समन्वित प्रबन्धन के लिए अल्पमूल्य बहुगुणन पद्धति के साथ ही जैव कीटनाशी प्रभेद डी ओ आर बी टी-1 का विकास और पंजीकरण किया गया एवं इसका फार्मूला KNOCK W.P का व्यावसायीकरण किया गया। ट्राइकोग्रामा चिलेनिस (इंडोग्रामा) के इन्डोसल्फान सहिष्णु प्रभेद का विकास किया गया। बासमती धान, कपास, सरसों, चना और मूंगफली के लिए इंटरएक्टिव (अन्तः सक्रिय) कियोस्क सहित कीट प्रबन्धन सूचना प्रणाली का विकास किया गया।
• भारतीय सूचना प्रणाली (INDUS) सॉफ्टवेअर के प्रयोग से देशज अधिसूचित किस्मों को डिजीटल किया गया। भारतीय परिस्थितियों के लिए 35 किस्मों के लिए DUS परीक्षण मापदंड तैयार किये गये।
• मेगा सीड प्रोजक्ट यानी महाबीज योगना के कारण वर्ष 2006-07 के दौरान एक वर्ष में उन्नत किस्मों के बीजों का उत्पादन दुगुना होकर 6,06,000 ‌क्व‌िंटल हो गया जिससे खेती के लिए जारी किस्मों का हस्तांतरण बेहद बढ़ गया।

संपर्क
डा. स्वपन कुमार दत्ता, उप महानिदेशक (फसल विज्ञान)
फसल विज्ञान संभाग, कृषि भवन, नई दिल्ली 110 114
फोनः (कार्यालय) 91-11-23382545
फैक्सः 91-11-23097003
ई-मेलः ddgcs.icar@nic.in

प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन संभाग
उपमहानिदेशक (प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन) इस संभाग के प्रमुख हैं और इनकी सहायता के लिए निम्न पदाधिकारी हैं- 3 सहायक महानिदेशक - सहायक महानिदेशक (मृदा), सहायक महानिदेशक (सस्य और कृषि वानिकी), सहायक महानिदेशक (समन्वित जल प्रबन्धन); दो प्रमुख वैज्ञानिक और एक वरिष्ठ वैज्ञानिक। संभाग में 6 अनुसंधान संस्थान, 3 अनुसंधान परिसर, एक ब्यूरो, परियोजना निदेशालय, 2 राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र, 11 अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजनाएं और 3 नेटवर्क परियोजनाएं हैं।

महत्वपूर्ण क्षेत्र
• आधुनिक यंत्रों और तकनीकों के प्रयोग से प्राकृतिक संसाधनों की खोज, अभिलक्षण एवं निगरानी।
• देश में विभिन्न कृषि पारिस्थितकी उपकेन्द्रों के लिए टिकाऊ भू-उपयोग योजनाओं का विकास।
• संसाधन संरक्षण और जीर्णोद्धार के मूल्य प्रभावी तरीके निकालना।
• आर्थिक और गैर-आर्थिक मापदंडों के जरिए उर्वरक, जल और अन्य आदानों को बढ़ाना।
• टिकाऊ मृदा स्वास्थ्य और फसल उत्पादकता के लिए अजैविक उर्वरक, जैविक खाद/कम्पोस्ट और जैव उर्वरकों के मिश्रण से समन्वित पादप पोषण प्रबन्धन।
• उत्पादन और आजीविका को बढ़ाने के लिए जल का बहु उपयोग।
• जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए खेत में जल प्रबन्धन।
• सूक्ष्म सिंचाई और उर्वरक पद्धति का मानकीकरण।
• लवणीय और जल संभर भूमियों के लिए जैव-निकासी सहित कम मूल्य प्रभावी निकास प्रौद्योगिकी का विकास।
• कृषि हेतु निम्न और सीमान्त गुणवत्ता का जल उपयोग।
• बारानी क्षेत्रों में संसाधन संरक्षण, उत्पादन बढ़ाने और आजीविका सृजन के लिए विभिन्न कृषि पारिस्थितिकि प्रक्षेत्रों में स्थानिक मॉडल जलसंभर का विकास।
• कृषि में कृषि-पारिस्थितिकी-प्रक्षेत्र अनुकूल विविधता।
• जैविक खेती के लिए कृषि क्रिया विशेष पैकेज का विकास।
• उत्पादन, आय और आजीविका बढ़ाने के लिए कृषि बागवानी, पशुधन और मात्स्यिकी आदि में स्थानिक समन्वित कृषि पद्धति का विकास।
• टिकाऊ आधार पर चारा, ईंधन, औद्योगिक लकड़ी छोटी इमारती लकड़ी और जैव ईंधन की आपूर्ति के लिए कृषि-वानिकी पद्धति।
• तटीय क्षेत्रों के लिए प्रौद्योगिकी विकास।
• कृषि मौसम परामर्श सेवाओं में सुधार और अधिक उत्पादन के लिए मौसम आधारित विशेषज्ञ पद्धति का विकास।
• कृषि उत्पादन पद्धति पर जलवायु परिवर्तन प्रभाव की निगरानी और इसके प्रतिकूल प्रभाव को कम करना।

उपलब्धियां
• देश (1:1 मिलियन स्केल), राज्य (1:250,000 स्केल) और कई जिलों (1:50,000 स्केल) के मृदा मानचित्र तैयार किये गये।
• प्रभावी संसाधन संरक्षण के लिए मृदा अपक्षरण मानचित्र (:4.4 मिलियन स्केल) देश हेतु और मृदा अपरदन मानचित्र राज्यों के लिए (1:250,000 स्केल) तैयार किये गये।
• बारानी क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय जलसंभर विकास कार्यक्रम (NWDPRA) को आधार बनाकर 47 मॉडल जनसंभर नेटवर्क का विकास किया गया।
• पर्वतीय जलसंभरों के लिए मृदा और जल संरक्षण/जैव अभियांत्रिकी पद्धतियों का विकास किया गया जिससे जलबहाव में 42 से 14% और मृदा अपरदन 11 से 2 टन/है. तक कमी आई।
• रेत के टिब्बों की गत‌‌ि को रोकने और शुष्क क्षेत्रों में नहरों में रेत जमा होने के लिए बालू टिब्बे और पौध रोपण की तकनीक का विकास किया गया।
• पहाड़ी क्षेत्रों में झूम खेती की वैकल्पिक कृषि क्रियाओं से फसल सघनता और उत्पादन बढ़ा।
• ड्रिप और छिड़काव सिंचाई से जल (30-25%), मशक्कत (50%), उर्वरक (30-40%) की बचत और उत्पादन (12-76%) बढ़ा।
• सिंचाई के लिए नहर के साथ लगे जलाशय के जरिए पोषित पम्प या गुरुत्वाकर्षण द्वारा दबावयुक्त सिंचाई पद्धति का विकास किया गया इसमें लागत लाभ दर 2.6 रही।
• विभिन्न भूमियों/बारानी परिस्थितियों के लिए जल संग्रहण जलाशयों का विकास किया गया।
• खुले कुंओं और ट्यूबवैलों, में तलछट रहित पानी के लिए रिचार्ज फिल्टर का विकास किया गया।
• बहावयुक्त पुनर्चक्रण आधारित सिंचाई पद्धति डिजाइन मापदण्डों का विकास किया गया और मूल्यांकन किया गया।
• देश में विभिन्न भू-उपयोग पद्धति के तहत मृदा कार्बन स्टॉक का डाक्यूमेंट तैयार किया गया।
• विभिन्न राज्यों के लिए डिजिटल मृदा उर्वरता नमूने (एन, पी, के, एस और सूक्ष्म पोषक तत्व) तैयार किये गये।
• मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक संस्तुतियों के लिए रेडी रेकनर विकसित किये गये। संतुलित उर्वरता को प्रोत्साहन देने के लिए देश की मुख्य फसल पद्धतियों हेतु समन्वित पोषण प्रबन्धन पैकेज का डाक्यूमेंट तैयार किया गया।
• किसानों के द्वारा बृहद पैमाने पर बहुगुणन और अपनाने के लिए जैव उर्वरक प्रौद्योगिकी का विकास किया गया।
• वर्मीकम्पोस्ट तकनीक का विकास किया गया।
• लीफ कलर चार्ट का नाइट्रोन प्रबन्धन (15 कि.ग्रा. नाइट्रोजन/हैक्टर धान में बचत) के लिए विकास किया गया।
• जलसंभर भूमियों में अधिक उत्पादन के लिए उभरी और धंसी क्यारी पद्धति का विकास किया गया।
• गंगा के मैदानों में समय, मशक्कत, ऊर्जा, जल और पोषण की बचत द्वारा खेती की लागत को कम करने के लिए संसाधन संरक्षण प्रौद्योगिकियों जैसे शून्य जुताई, क्यारी रोपण, लेज़र भूमि समतलीकरण की संस्तुति की गयी।
• 25 मिलियन हैक्टर क्रांतिक रूप से निम्नीकृत अम्लीय मृदाओं के सुधार के लिए प्रौद्योगिकी पैकेज का विकास किया गया। संस्तुत मृदाओं के साथ 2-4 ‌‌‌‌‌क्विं/हैं चूना देने से 25 मिलियन टन वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन बढ़ने की संभावना है।
• देश में लवण प्रभावित मृदाओं के (1:1 मिलियन स्केल) और आठ राज्यों (1:2,50,000 स्केल) के डिजिटल मानचित्र तैयार किये जाये।
• क्षारीय मृदाओं में उच्च फसल उत्पादकता सुनिश्चित करने के लिए कम मात्रा जिप्सम (25% जिप्सम आवश्यकता) और क्षार सहिष्णु किस्मों (धान-सी एस आर 13 और गेहूं
के आर एल 19) के साथ मूल्य प्रभावी प्रौद्योगिकी का विकास किया गया।
• जलसंभर क्षारीय मृदाओं के लिए उप-सतह निकासी प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन किया गया।
• सिंचाई हेतु क्षारीय जल के पुनर्चक्रण का विकास किया गया। तटीय क्षारीय क्षेत्रों के लिए लवणीय जल के ऊपर स्किम ताजा जल लाने हेतु डोरोवू प्रौद्योगिकी का विकास किया गया।
• लवण प्रभावित मृदाओं के जैव सुधार हेतु कृषि-वानिकी मॉडल विकसित किये गये।
• कृषि वानिकी पर ‘एग्रो फोरस्ट्री बेस’ नामक बृहद ऑन लाइन डाटाबेस का सृजन किया गया।
• कागज़ काष्ठ गूदा (पल्प वुड) और हर्बल औषधि आधारित उद्योगों से संबंधित कृषि वानिकी पद्धतियों का विकास किया गया।
• फसलों, बागवानी, कृषि वानिकी, मात्स्यिकी, मुर्गीपालन, शूकर पालन, मशरूम उत्पादन और मधुमक्खी पालन आदि को मिलाकर समन्वित कृषि पद्धतियों का विकास किया गया। इसमें उत्पादन बढ़ाने की 2-7 गुणा क्षमता है।
• देश में विभिन्न कृषि पारिस्थितिक स्थितियों के लिए उचित खरपतवार प्रबन्धन क्रियाओं का विकास किया गया।
• एग्रोमेट और मौसम आधारित कृषि परामर्श के लिए ‘क्रॉप वेदर आउटलुक’ वेबसाइट क्रीडा, हैदराबाद से शुरू की गयी।

परामर्श सेवाएं
• मृदा संसाधन मानचित्रण और भूमि उपयोग नियोजन
• प्रतिभागी जल संभर प्रबन्धन
• समन्वित कृषि पद्धतियां विकसित
• लवणीय क्षारीय/अम्लीय/जलसंभर मृदाओं का सुधार
• डिजीटल मृदा उर्वरता मानचित्र तैयार
• मृदा परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना
• जैव उर्वरक उत्पादन इकाई की स्थापना
• वर्मी कम्पोस्ट इकाई की स्थापना
• पोषणयुक्त कम्पोस्ट का उत्पादन
• नये उर्वरक उत्पादों का एग्रोनोमिक और आर्थिक मूल्यांकन
• खदान कटान/प्रस्रवण क्षेत्र/तंगघाटी/भूस्खलन/खिसकन का पुर्नुद्धार
• जल संग्रहण ढांचों का निर्माण
• रेगिस्तान में रेतीले टिब्बों का स्थिरीकरण और संरक्षण पट्टी रोपण
• भूजल का रिचार्ज
• मखाना की खेती

संपर्क
डा. ए.के. सिंह, उपमहानिदेशक (प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन)
प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन संभाग, कृषि अनुसंधान भवन-II, नई दिल्ली-110 012
फोनः 91-11-258448364, 91-11-25848366, 91-11-25842285, एक्स 1101
ई-मेलः aksingh@icar.org.in, aks_wtc@yahoo.com, aksingh.icar@gmail.com

पशु विज्ञान संभाग
भा.कृ.अनु.प. का पशु विज्ञान संभाग 19 अनुसंधान संस्थानों और उनके क्षेत्रीय केन्द्रों में अनुसंधान गतिविधियों का समन्वयन और निगरानी करता है। उप महानिदेशक (पशु विज्ञान) इस संभाग के प्रमुख हैं और पशु स्वास्थ्य, पशु उत्पादन और प्रजनन या पशु पोषण और कार्यिकी संभागों में 3 सहायक महानिदेशकों की सहायता करते हैं और 3 वरिष्ठ वैज्ञानिक इनके अधीनस्थ हैं। डेयरी और पशु उत्पाद प्रौद्योगिकी का कार्य सहायक महानिदेशक (ए पी एंड बी) के अधीन है। इस संभाग के अधीन 3 राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान हैं जिसमें से 2 समतुल्य विश्वविद्यालय हैं, 4 केन्द्रीय अनुसंधान संस्थान। राष्ट्रीय ब्यूरो, 4 प्रायोजना निदेशालय और 6 राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र और एक राष्ट्रीय कृषि आर्थिकी और नीति अनुसंधान केन्द्र हैं। देश के विभिन्न भागों में इस संभाग के तहत 7 अखिल भारतीय अनुसंधान परियोजनाएं और 7 अनुसंधान नेटवर्क कार्यक्रम कार्यरत हैं। इसके अलावा विभिन्न भा.कृ.अनु.प. संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में कई तदर्थ प्रायोजनाएं हैं।

परिदृश्य
खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए उत्पादन बढ़ाने, लाभ बढ़ाने, प्रतिद्वन्दता और पशुधन तथा मुर्गीपालन में टिकाऊपन लाने की प्रौद्योगिकी का विकास।

मिशन
पशु पालन और कुक्कुट पालन के मौजूदा और उभरते क्षेत्रों में आवश्यकता आधारित अनुसंधान को बढ़ावा देना ताकि उत्पादन को बढ़ाया जा सके और क्षमता तथा सही उत्पादन की दूरी को कम करना और वैश्वीकरण की चुनौती के लिए देश को तैयार करना।

महत्वपूर्ण क्षेत्र
• देशी पशुधन संसाधनों के लिए आण्विक पहचान
• भ्रूण जनित हानि और प्रजनन दक्षता में सुधार
• रोग प्रबन्धन हेतु मार्कर सहायक चयन द्वारा आनुवंशिक सहिष्णुता का दोहन
• भैंस और बकरी जीनोमिक्स
• पशु स्वास्थ्य और उत्पादन के लिए स्टैम कोशिका अनुसंधान
• इन विवो और इन विट्रो द्वारा कम गुणवत्ता के रेशे में सुधार
• पशु के सूक्ष्म पोषण स्तर के आकलन हेतु जैव रसायन मार्कर
• पोषण उपयोगिता बढ़ाने में प्रोबायोटिक/प्रीबायोटिक
• पशुओं से ग्रीन हाऊस गैस स्राव का प्रयोग
• बायोटैक और नैनोटैक टूल्स द्वारा विभिन्न रोगों हेतु नैदानिक और इम्यूनो प्रोफाइलेक्टिक्स का विकास
• नई पीढ़ी के और देशी दवा फार्मूले में फार्माकोजीनोमिक्स और डायनेमिक्स
• फार्मेक्यूटिकल उत्पादन हेतु पराजीनी मुर्गी और सूअर
• पर्यावरण और औद्योगिक प्रदूषक का अवशेष विश्लेषण; माइकोटॉक्सिन और माइकोटॉक्सिकोसिस
• पशु उत्पादों के मूल्य संवर्धन, शेल्फ लाइफ बढ़ाने और गुणवत्ता सुनिश्चित करते हुए प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी का विकास और सुधार
• बेहतर स्वास्थ्य के लिए डिजाइनर/डाइट पशु उत्पाद
• पशुधन उत्पादन आर्थिकी और विपणन

सुदृढ़ता

मानव शक्ति
कैडर में वैज्ञानिकों की कुल संख्याः 1044
वैज्ञानिकों की वर्तमान संख्याः 780

बुनियादी ढांचा

फार्म और पशु
गोपशु, भैंसों, भेड़ों, बकरियों, सूअरों, ऊंटों, अश्वों, याक, मिथुन, खरगोश और मुर्गियों के लिए प्रजाति विशेष अनुसंधान फार्म देश भर में फैले हैं।

प्रयोगशालाएं
पशु आनुवंशिकी और प्रजनन, पोषण, कार्यिकी और पुर्नोत्पादन, पशु स्वास्थ्य और पशु उत्पादन प्रौद्योगिकी के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आधारभूत और नीतिगत अनुसंधान हेतु प्रयोगशालाएं कार्यरत हैं।

विशेष सुविधाएं
जैव-सुरक्षा और जैव-संदूषण प्रयोगशालाएं, आण्विक प्रयोगशालाएं, वीर्य मूल्यांकन और गुणवत्ता नियंत्रण, अवशेष विश्लेषण, आहार विश्लेषण/गुणवत्ता नियंत्रण, भ्रूण हस्तांतरण प्रयोगशालाएं, आण्विक जैविकी, गोपशु जैव प्रौद्योगिकी, दुग्ध और दुग्ध उत्पादन प्रसंस्करण ईकाई, मांस और मांस प्रसंस्करण ईकाई, मॉडल डेरी प्लांट, वैक्सीन उत्पादक ईकाई, जर्मप्लाज्म और डी एन ए बैंक

मानव संसाधन विकास
पशुचिकित्सा, पशु विज्ञान और डेरी विज्ञान के विभिन्न संकायों में स्नातक, स्नातकोत्तर और डॉक्टरल डिग्री कार्यक्रम दो समतुल्य विश्वविद्यालयों में संचालित किये जाते हैं।
अधिक जानकारी हेतु संपर्क करें-
www.ndri.nic.in और www.ivri.nic.in
अनुसंधानकर्त्ताओं, विस्तार कर्मियों, अध्यापकों, विद्यार्थियों और कृषकों हेतु एडवांस विशेष कार्यक्रमों का आयोजन समय-समय पर किया जाता है। अधिक जानकारी हेतु संस्थान विशेष की वेबसाइट देखें।
राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग
पशु विज्ञान के कुछ विशेष क्षेत्रों जैसे जैव प्रौद्योगिकी और आण्विक जैविकी के कुछ सांझा कार्यक्रम अग्रणी राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों के साथ मिलकर संचालित किये जाते हैं।

उपलब्धियां
पशु उत्पादन
• अधिक दुग्ध उत्पादन हेतु गोपशु, करन स्विस, करन फ्रीज और फ्रीजवाल का संकरण
• लेअर का मुर्गी उत्पादन बढ़कर 300 अंडे/वर्ष/पक्षी
• ब्रायलर शारीरिक भार में 35 दिन में 1.5 कि.ग्रा. वृद्धि
• मुर्रा भैंस का 2200 कि.ग्रा. दुग्ध उत्पादन/दुग्धकाल श्रेणीकरण
• ग्रामीण मुर्गी पालन हेतु दुकाजी मुर्गी किस्में
• मिथुन, याक, ऊंट, बकरी, सूअर और अश्वों में कृत्रिम वीर्यदान
• देशी पशुधन और कुक्कुट जननद्रव्य का आण्विक और शारीरिक लाक्षणिक वर्णन
• विभिन्न पशुधन और कुक्कुट जनन द्रव्य हेतु संरक्षण तकनीकें
• अच्छी ऊंन, गलीचे और मांस हेतु भेड़ की सुधरी किस्में
• छोटे रूमन्थी पशुओं हेतु आश्रयस्थल प्रबन्धन

पशु पोषण और कायिकी
• देश के विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों हेतु पशु आहार संसाधन पर डाटाबेस
• मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों हेतु सोयाबीन खली उपलब्धता
• विभिन्न कृषि परिस्थितिकी क्षेत्रों हेतु क्षेत्र विशेष खनिज मिश्रण
• स्थानीय उपलब्ध गैर-परम्परागत आहार सामग्री से संपूर्ण आहार ब्लॉक
• खली हेतु मूल्यप्रभावी अविषाक्तता प्रौद्योगिकी
• उच्च उत्पादक गोपशुओं हेतु बाई-पास आहार प्रौद्योगिकी
• कम गुणवत्ता वाले चारे के उन्नत उपयोग हेतु यूरिया-अमोनियाकरण
• विभिन्न स्रोतों से सूक्ष्मपोषकों की जैव उपलब्धता
• छोटे रूमन्थी पशुओं हेतु आहार प्रबन्धनों का डिजाइन और विकास
• गोपशु और भैंसों में समयानुसार गर्मी की जांच करने के लिए क्राइस्टोस्कोप
• भैंसों, भेड़ों, गोपशु, बकरियों और याक में भ्रूण हस्तांतरण प्रौद्योगिकी
• अंडा उत्पादन बढ़ाने हेतु हार्मोन अनुकूलन प्रोटोकॉल
• अश्वों में जल्दी गर्भधारण के लिए नैदानिक किट

पशु स्वास्थ्य
• भारत में रिंडरपेस्ट उन्मूलन
• खुरपका और मुंहपका रोग वैक्सीन उत्पादन के लिए देशी प्रौद्योगिकी
• भेड़ और बकरी प्लेग के लिए सजीव तनुकारी वैक्सीन
• पक्षी इन्फ्लुएंजा का निदान और लगातार निगरानी से नियंत्रण
• देशी प्रभेदों के प्रयोग से पक्षी इन्फ्लुएंजा के विरूद्ध वैक्सीन
• राष्ट्रीय खुरपका और मुंहपका रोग नियंत्रण कार्यक्रम में तकनीकी और वैज्ञानिक समर्थन
• खुरपका और मुंहपका रोग निदान और नियंत्रण हेतु शत-प्रतिशत निर्यात विकल्प
• अश्व वायरस संक्रमण हेतु नैदानिक किट और वैक्सीन
• जी आई परजीवी हेतु नैदानिक किट

पशु उत्पाद प्रौद्योगिकी
• निम्न कोलेस्ट्रॉल घी
• देर तक ताजा रहने वाली आम लस्सी
• औषधीयुक्त घी
• रसमलाई, कुल्फी, खीर मिक्स, गुलाब जामुन मिक्स उत्पादन के लिए देशी प्रौद्योगिकी
• व्यावसायिक उत्पादन हेतु कुंडा जैसे परम्परागत दुग्ध उत्पादों में फेर-बदलाव करके अनुकूलन
• विभिन्न कुक्कुट मांस उत्पादन जैसे चिकन चंकालोना, चिकन इडली, नगेट्स, पैटीज़, अचार और कबाब

प्रौद्योगिकियों का व्यावसायीकरण
• विभिन्न कृषि प्रौद्योगिकी क्षेत्रों हेतु क्षेत्र विशेष खनिज मिश्रण और गैर-परम्परागत आहार स्रोतों के उपयोग से संपूर्ण आहार ब्लॉक
• पी आर आर वैक्सीन
• एफ एम डी और एच एस युक्त तैल वैक्सीन
• अश्व इन्फ्लुएंजा वैक्सीन
• थर्मोस्टेबल आई बी डी वैक्सीन
• ई एच पी वैक्सीन
• मुंहपका और खुरपका निगरानी हेतु नैदानिक किट
• उच्च उत्पादक पशुओं हेतु बाईपास प्रोटीन प्रौद्योगिकी
• उच्च अंडा उत्पादन के लिए हार्मोन अनुकूलन,

संपर्क
डा. स्वपन कुमार दत्ता, उप महानिदेशक (पशु विज्ञान)/अतिरिक्त भार
पशु विज्ञान संभाग, कृषि भवन, नई दिल्ली-110 114 भारत
फोनः 91-11-23381119, 91-11-23388991 एक्स 200
फैक्सः 91-11-23097001
ई-मेलः ddgcs.icar.@nic.in

मात्स्यिकी विभाग
उपमहानिदेशक (मात्स्यिकी), संभाग प्रमुख की सहायता के लिए दो सहायक महानिदेशक मौजूद हैं- सहायक महानिदेशक (समुद्री मात्स्यिकी) और सहायक म‌हानिदेशक (अन्तःस्थलीय मातिस्यकी) दो प्रमुख वैज्ञानिक और अवर सचिव। इस संभाग के 5 अनुसंधान संस्थान एक ब्यूरो, एक राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र और एक समतुल्य विश्वविद्यालय हैं। इसके अलावा कई तदर्थ अनुसंधान परियोजनाएं और रिवा‌ल्‍विंग फंड योजनाएं चालू हैं।

महत्वपूर्ण क्षेत्र

मत्स्य प्रग्रहण
• व्यावसायिक रूप से उपयोगी समुद्री मात्स्यिकी स्टॉक का प्रजाति अनुसार जैविक डाटाबेस और क्षमतावान स्रोतों की संभावना और उत्पादन
• मत्स्य उत्पादन के उत्प्रेरण के लिए कम्प्यूटर आधारित प्रबन्धन
• समुद्री जैवविवि‌धिता, डाटाबेस, संरक्षण और प्रबन्धन विशेष तौर से शार्क और समुद्री स्तनपायी जन्तु
• जी आई एस स्तर पर राष्ट्रीय समुद्री और नदीय मात्स्यिकी
• नहरों और झीलों आदि में लघु और मध्यम आकार की मात्स्यिकी हेतु मत्स्य उत्पादन बढ़ाने हेतु उपकरण
• जी आई एस स्तर पर अंतस्थलीय मात्स्यिकी संसाधन मूल्यांकन और जैव विविधता मूल्यांकन, इनमें प्रग्रहण और प्रजाति विशेषता शामिल हैं।
• मत्स्य स्टॉक और जलजीव जैवविविधिता में नदी सहसंबंध का प्रभाव
• खुला जल जैव पारिस्थितिकी में पारिस्थितिकी सूचना और मत्स्य क्षमता
• उत्पादन को टिकाऊ बनाने और मत्स्य व्यवहार के अध्ययन हेतु नदी पद्धति में पर्यावरणीय बहाव का आकलन
• दबावयुक्त जलीय जैव परिस्थितिकी का पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन, मत्स्य स्वास्थ्य निगरानी और जैव उपचार
• पर्वतीय मत्स्य संसाधन मूल्यांकन और प्रबन्धन
• स्टॉक बढ़ाकर जलाशय और बाढ़ युक्त जमीन पर मात्स्यिकी का उन्नत प्रबन्धन

मत्स्य संवर्धन
• ताजा और समुद्री जल में सवंर्धन हेतु प्रजाति विशेष और जलजीव पद्धति की विविधिता
• वृहद जलाशयों और बाढ़युक्त भूमि पर पिंजड़ा और बाड़ा संवर्धन प्रौद्योगिकी को उन्नत करना।
• शीत जल मात्स्यिकी हेतु प्रजनन और संवर्धन प्रौद्योगिकी का उन्नयन
• मूल्यवान फिनफिश और शैलफिश का प्रजनन और संवर्धन
• फिनफिश और शैलफिश स्वास्थ्य प्रबन्धन और आम रोगों के खिलाफ प्रतिकारक प्रबन्धन और रोग प्रबन्धन
• जैविक जल जीव संवर्धन
• मत्स्य पोषण, आहार विकास और प्रौद्योगिकी
• जल जीव प्रजातियों (फिनाफिश और शैलफिश) का आनुवंशिक सुधार
• मछली और शैलफिश कोशिका पंक्तियों का विकास
• सजावटी मत्स्य प्रजनन और संवर्धन
• विभिन्न जलजीव संवर्धन कार्यकलापों के लिए जलीय बजट सहित जल और व्यर्थ जल प्रबन्धन
• टिकाऊ सीवेज आधारित जलजीव पालन पद्धति हेतु उत्पादन मॉडल
• फिनफिश और शैलफिश संवर्धन में अन्तः स्थलीय लवणीय जल संसाधन उपयोगी संवर्धन प्रौद्योगिकियां
• समन्वित तटीय क्षेत्र प्रबन्धन

मत्स्य आनुवंशिक संसाधन
• जननद्रव्य संसाधनों का कैटलॉग तैयार करना और डाटाबेस का विकास
• जैवविविधिता भंडार
• अन्तः विशेष एंड्रोजेनेसिस द्वारा पोस्ट मार्टम स्पर्श संरक्षण और जीनोम संरक्षण की प्रौद्योगिकी का विकास
• आनुवंशिक सुधार और जैव प्रौद्योगिकी
• विदेशी और संगरोध, प्रमुख रिस्क विश्लेषण और रोग निदान
• अन्तः और अन्तराविशेष स्तरों पर विभिन्न जैव पारिस्थितिकियों में मत्स्य और शैलफिश एवं संबंधित समूहों का जीनोटाइप तैयार करना
• समुद्री सूक्ष्मजीवों का आनुवंशिक कैटलॉग तैयार करना
• मछली और शैलफिश में कोशिका आनुवंशिकी और जीनोटॉक्सिटी अध्ययन
• ताजा जल और समुद्री मात्स्यिकी के जननद्रव्य संसाधनों का संरक्षण और प्रबन्धन

मत्स्य प्रग्रहण प्रौद्योगिकी
• मत्स्य पोत और गियर मिश्रित (इंधन दक्ष) का डिजाइन
• ई ई जेड हेतु पर्यावरण हितैषी उत्तरदायित्वपूर्ण मात्स्यिकी तकनीक
• मत्स्य प्रग्रहण, प्रसंस्करण और परिवहन में ऊर्जा संरक्षण
• उप प्रग्रहण उपयोग हेतु सहायता
• नदियों और जलाशयों में मत्स्य स्टॉक दोहन हेतु तकनीकें विकसित

प्रग्रहण उपरांत प्रौद्योगिकी
• मत्स्य उत्पादों हेतु प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, पैक करना और विपणन
• प्रग्रहण उपरांत नुकसान को कम करना और मत्स्य अवशेषों का प्रभावी उपयोग
• औषधीय महत्व के जैव सक्रिय तत्व
• स्वच्छता, साफ-सफाई और गुणवत्ता नियंत्रण
• गुणवत्ता प्रबन्धन और खाद्य सुरक्षा
• कार्य आहार उद्योगों की स्थापना हेतु सहायता

अभियांत्रिकी
• मात्स्यिकी और मत्स्य प्रसंस्करण हेतु पोत पर उपयोगी और तटीय उपकरणों का विकास
• प्रग्रहण और प्रग्रहण उपरांत मात्स्यिकी क्षेत्र में जैव सूचना तंत्र और सूचना प्रौद्योगिकी
• जलाशयों में रिसाव और वाष्पोत्सर्जन नियंत्रण हेतु तकनीकों का विकास
• रंध्रयुक्त और ढीली मिट्टी में मत्स्य फार्म निर्माण की तकनीक विकसित

मात्स्यिकी शिक्षा
• उभरते क्षेत्रों में मानव संसाधन विकास

उपलब्धियां
• पर्यावरण हितैषी और संसाधन विशेष ट्राल, वी आकार के ऑटर बोर्ड, टर्टल एक्सक्लूडर उपकरण, सक्वेअर मैश काड एंडस, एफ आर पी शीथ, अनुपचारित रबरवुड डोंगी, अन्तःस्थलीय क्षेत्र हेतु 5.22 एम एल ओ ए एल्यूमिनियम समिश्रण नाव का प्रारूप, जलाशय मात्स्यिकी हेतु एक पंक्ति मत्स्यन
• ईंधन दक्ष 15.5 मी. स्टील ट्रालर ‘सागर कृपा’ का डिजाइन और निर्माण किया गया, यह इसी आकार के परम्परागत ट्रॉलर से 20% कम ईंधन की खपत करता है।
• कटलफिश, स्कविड, थ्रेडफिन ब्रीम, तिलापिया, कतला और कार्प से कई मूल्य संवर्द्धित उत्पादों का मानकीकरण किया गया
• पकाये गये उत्पादों को सीलयुक्त आसान पाउच में पैक करने की विधि का विकास किया गया। इनमें ये उत्पादन एक वर्ष से अधिक समय तक संरक्षित रखे जा सकते हैं।
• भारत में पहली बार समुद्री स्तनपायी प्राणियों में हेतु पी सी आर आधारित लिंग निर्धारण और माइटोन्ड्रियल डी एन ए क्रम आधारित प्रजाति पहचान का मानकीकरण किया गया।
• श्वेत धब्बा रोग और पीत शीर्ष विषाणु की जांच की विधि का विकास किया गया।
• प्रग्रहण प्रजनन स्टॉक का निकास किया गया और कुर्मा श्रिम्प की प्रजाति का विविधता हेतु सफल पालन किया गया।
• लवणीय जल में एम. जेपोनिका का संवर्धन किया गया। इसमें जीवितता 83% रही और उत्पादन 1018 कि.ग्रा./है./ 4 माह रहा।
• सीबास एल एटस केल्कारीफर का प्रग्रहण भूमि आधारित ब्रूड स्टॉक का विकास किया गया और एफ 4 पीढ़ी का उत्पादन किया गया। सी बास के हैचरी बीज उत्पादन हेतु प्रौद्योगिकी पैकेज का मानकीकरण किया गया और एक मॉडल समुद्री फिनफिश हैचरी की स्थापना की गयी।
• पीली कैटफिश होराबेगरस ब्रेकिसोमा और ताजा जल ईल मेस्टासेम्बेलस एक्युलेट्स का सफल उत्पादन किया गया।
• महाकाय ताजा जल झींगा मैक्रोब्रेकियम रोज़नबर्गी का अन्तः स्थलीय लवणीय जल का प्रयोग करके पिंजड़े में प्रजनन किया गया और पश्च लार्वा में अनुकूल आयन सुधार करके पालन किया गया।
• पर्वतीय क्षेत्रों के लिए स्थानिक और ऊंचाई विशेष मिश्रित कार्प पालन प्रौद्योगिकी का विकास किया गया।
• हनीकॉम्प समूहक एपिनफेलस मेर्रा के लिए लार्वा पालन प्रोटोकॉल का विकास किया गया और एक बीज उत्पादन ट्रायल सफलतापूर्वक सम्पन्न किया गया।
• इडियन पर्ल ओयस्टर पिनक्टाडा फ्यूकाटा ओर एबलोन, वेरिया हेलियोटिस में उत्तम संवर्धन तकनीक के माध्यम से प्रयोगशाला में समुद्री मोती उत्पादन सफलतापूर्वक किया गया।
• सजावटी मोती उत्पादन किया गया जिसमें पिनक्टाडा फूकाटा मोतियों को लोहे और मैगनीज जैसी भारी धातुओं के प्रयोग से नीले रंग से गुलाबी रंगत में परिवर्तित किया गया।
• सैन्ड लोबस्टर की दो प्रजातियों (थेनस ओरिएन्टेलिस, स्काइलेरस रूगोसस) का पिंजड़े में सफल प्रजनन किया गया और या तीन चार सप्ताह में लार्वा चक्र पूर्ण हो गया।
• सजावटी मछलियों की 3 किस्मों डेसिलस ट्राइमेकुलेट्स, पोमासेन्ट्रस कोयलेसटिस और डेसिलस अरूआनस के पिंजड़े में स्पॉन तैयार किये गये।
• पिजड़े में प्रजनित समुद्री कुकम्बर, होलोथूयुरिया स्काबरा (औसत आकार 25 मि.मी.) के 1200 शिशुओं का समुद्र में पालन किया गया।
• श्वेत धब्बा सिंड्रोम विषाणु जांच की डुप्लेक्स पी सी आर किट का व्यावसायीकरण किया गया।
• चयनित प्रजनन तकनीक के तहत रोहू लोबियो रोहिता में 17% प्रति पीढ़ी की दर से विकास में बढ़त का प्रदर्शन किया गया और मछुआरों को जयंती रोहू वितरित की गयी।
• लुप्त प्राय रक्त पुंछ बार्ब, गोनोप्रोक्टेरस करमका के लिए स्पर्म हिमसंरक्षण तकनीक का मानकीकरण किया गया।
• रोहू, लोबियो रोहिता में अंडों का हिम संरक्षण सफलतापूर्वक किया जा सका।
• हैचरी में चमकदार बैक्टीरिया के नियंत्रण की प्रतिजैविक तैयारी का विकास किया गया।
• पन्द्रह मत्स्य प्रजातियों और मैक्रोब्रेकियम रोज़नबर्गी हेतु पॉलीमोरफिक माइक्रोसेटेलाइट और एलोजाइम मार्कर विकसित किये गये।
• चिटाला चिटाला और पेंगासिउस पेंगासिउस हेतु माइक्रोसेटेलाइट युक्त जीनोम पुस्तकालय का निर्माण किया गया।
• ‘फिश क्रोमोसोम वर्ल्ड’ डाटाबेस का विकास किया गया। इसमें 34 कुलों और 9 प्रकार की 126 फिनफिश प्रजातियों की कार्योमोरफोलोजिकल सूचना उपलब्ध है।
• एलोजाइम और माइक्रोसेटेलाइट के उपयोग से गंगा के मैदानी भागों में विभिन्न नदी पद्धति में लोबियो रोहिता, कतला कतला, सिरहिन्स मृगला, लोबियो डेरो और एल डायचेलस के स्टॉक विश्लेषण किया गया।
• पी सी आर द्वारा विदेशी ओ आई ई सूचीयुक्त रोगाणु की नैदानिक क्षमता का विकास किया गया।
• राष्ट्रीय रणनीति योजना की सहायता के लिए जलीय विदेशी और संगरोध के प्रवेश हेतु मार्गदर्शिका का विकास और प्रकाशन किया गया।
• छोटे जलाशयों में राष्ट्रीय औसत 20 कि.ग्रा./है./वर्ष की तुलना में 220 कि.ग्रा./है./वर्ष का उच्च मत्स्य उत्पादन स्तर प्राप्त किया जा सका।

सम्पर्क
डा. अरविन्द कुमार, उपमहानिदेशक (मात्स्यिकी)/अतिरिक्त भार
मात्स्यिकी संभाग, कृषि अनुसंधान भवन-II, नई दिल्ली 110 012
फोनः 91-11-25846738, 91-11-25842284/85/62/70/71
एक्सः 1309
फैक्सः 91-11-25841955
ई-मेलः ddgedn@icar.org.in

कृषि अभियांत्रिकी संभाग
कृषि अभियांत्रिकी और प्रौद्योगिकी की कृषि में उत्पादकता और लाभ बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके 5 प्रमुख क्षेत्र हैं-
(1) कृषि मशीनीकरण (2) कटाई उपरांत संरक्षण और मूल्य संवर्धन (3) सिंचाई और निकासी अभियांत्रिकी (4) ऊर्जा प्रबन्धन (5) सूचना प्रौद्योगिकी। इस संभाग के 6 संस्थान, 6 अखिल भारतीय अनुसंधान परियोजनाएं, 30 तदर्थ योजनाएं और 18 रिवाल्विंग फंड योजनाएं हैँ।

महत्वपूर्ण क्षेत्र
• समयबद्ध और दक्ष कृषि क्रियाओं को करने के लिए उचित यांत्रिक पद्धतियों और रणनीतियों का विकास
• शुष्क भूमि खेती, पहाड़ी क्षेत्रों में खेती, पशुपालन और मात्स्यिकी के लिए यांत्रिक पद्धतियों का विकास
• कृषि क्रियाओं में अड़चनों को दूर करके कार्य दक्षता को बढ़ाना
• कृषक महिलाओं के लिए उपयुक्त औजारों और मशीनों का विकास
• कृषि उत्पादन और प्रसंस्करण कार्यकलापों में ऊर्जा प्रबन्धन, जैव ईंधन का प्रयोग और गैर-परम्परागत ऊर्जा संसाधनों का उपयोग
• कटाई उपरांत नुकसान को कम करना, कृषि उत्पादों में मूल्य संवर्धन, कृषि अवशेषों का उपयोग और उपोत्पाद का प्रशोधन

उपलब्धियां
• दक्ष कृषि संचालनों और संसाधन संरक्षण के लिए कृषि मशीनों का विकास जैसे- लेज़र भूमि समतलीकरण, सैल्फ-प्रोपेल्ड स्प्रेयर, धान बीजक, सब्जी रोपक, गन्ना रोपक आदि
• कृषक महिलाओं की मशक्कत कम करने के लिए दक्ष फार्म मशीनों का विकास और कृषि दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए संस्तुतियां और कृषि यंत्रों का विकास
• सौर रेफ्रीजरेटर; कम लागत सौर कुकर और वाटर हीटर में पुर्ननवीकरण ऊर्जा प्रौद्योगिकी का विकास; उच्च क्षमतायुक्त स्टोव; गैसीफायर, फसल अवशेषों से तरल ईंधन; कम लागत के बायोगैस प्लांट, कृषि अवशेषों का जैवीय उपयोग; पशु चालित कृषि प्रसंस्करण ईकाईयां, कृषि अवशेषों के प्रयोग हेतु बैल चालित जनरेटर और पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए अन्य पुर्ननवीकरण ऊर्जा स्रोत।
• कटाई उपरांत नुकसान को कम करने और मूल्य वर्धन के लिए क्षेत्रीय और समुदाय विशेष उपकरण और प्रसंस्करण विकसित।
• सोयाबीन छिलका उतारना; सोयानट; सोया फ्लेक मशीन, सोया स्नैक, कुटीर सोया-पनीर प्लांट; सोया आधारित खाद्य उत्पाद; सोया आटा और तेल के लिए पायलट प्लांट; भिंडी युक्त सोया खाद्यान्न स्नैक्स।
• जूट प्लांट रिबनर विकसित; जूट कताई को पर्यावरण हितैषी किया, क्वालिटी जांच के लिए कच्चे जूट की ग्रेडिंग; जियोटैक्सटाईल; जूट स्टिक पार्टिकल बोर्ड का निर्माण, जूट कृषकों की आय बढ़ाने और जूट के विविध उपयोग के लिए किया गया।
• कपास गिनिंग, दृढ़ता जांच, कपास रेशे की शुद्धता जांचने के लिए न्यूरॉल नेटवर्क, विविध स्पीड डबल रोलर; उन्नत माइक्रो स्पिनिंग पद्धति; कपड़ों के लिए अग्नि रिडारडेशन फिनिश; कॉटन कोयर कम्पोजिट, कागज़ के लिए गूदा, कपास पौधों के तनो से पार्टिकल बोर्ड और कोरोगेटिड बॉक्स; टैक्सटाइल मिल अवशेषों से बायोगैस बनाने के लिए प्रौद्योगिकी विकसित।
• नये लाख परपोषी की पहचान; लाख कीटों का आण्विक विश्लेषण; श्रेष्ठ लाख पंक्तियां विकसित; लाख कीट प्रबन्धन।
• शैलेक तैयार करने; ब्लीच लाख; वैक्स रहित, रंगहीन लाख; लाख रंग और वैक्स लाख फैक्ट्री अवशेषों से; सुगंधित तत्व; कुसुम की पंखुड़ियों से प्राकृतिक रंग और हर्बल चाय; फलों और सब्जियों को देर तक ताज़ा रखने के लिए लाख वैक्स आधारित इमल्शन का विकास।
• सतही, उप सतही और उर्ध्व निकासी; बोरवैल के जरिए कृत्रिम भू-जल रिचार्ज; कूंड सिंचाई हेतु स्वचालित बहाव प्रणाली का विकास।
• राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पद्धति के संस्थानों में कृषि अनुसंधान सूचना प्रणाली (एरिस) का सृजन और सुदृढ़ीकरण

संपर्क
डा. एम.एम. पांडे, उप महानिदेशक (कृषि अभियांत्रिकी)
कृषि अभियांत्रिकी संभाग, कृषि अनुसंधान भवन-II, नई दिल्ली 110 012
फोनः 91-11-25843415
फैक्सः 91-11-25842660
ई-मेलः mmpandey@icar.org.in

कृषि शिक्षा संभाग
कृषि शिक्षा संभाग देश में उच्च कृषि शिक्षा के क्षेत्र में नियोजन, विकास समन्वयन और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कार्य में संलग्न है। यह कार्य भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा कृषि विश्वविद्यालयों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, समतुल्य विश्वविद्यालयों, केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय और कृषि संकाय वाले केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की भागीदारी और प्रयत्नों से कृषि उच्च शिक्षा को लगातार, उत्तरोत्तर गुणवत्ता और सार्थकता हेतु किया जाता है। इस संभाग के तहत राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबन्धन अकादमी (नार्म) हैदराबाद है। इसका कार्य अनुसंधान और शिक्षा नीति, नियोजन और प्रबन्धन में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पद्धति (नार्स) में क्षमता निर्माण कार्य मुहैया करना है।
भा.कृ.अनु.प. मुख्यालय में स्थित इस संभाग के प्रमुख उपमहानिदेशक (शिक्षा) हैं और इसके 3 अनुभाग हैं- (1) मानव संसाधन विकास (2) शिक्षा नियोजन और विकास (3) शिक्षा गुणवत्ता सुनिश्चितता और सुधार और प्रत्येक अनुभाग के प्रमुख एक सहायक महानिदेशक हैं।

महत्वपूर्ण क्षेत्र
• नीतिगत समर्थन, प्रत्यायन, शैक्षिक नियमन, वैयक्तिक नीतियों, पाठयक्रम की समीक्षा और डिलवरी पद्धति, बुनियादी ढांचे और सुविधाओं का सृजन/सुदृढ़ीकरक करके विकासात्मक समर्थन, संकाय क्षमता में सुधार और अखिल भारतीय प्रतियोगिताओं के जरिये छात्रों का दाखिला आदि के जरिये देश में उच्च कृषि शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता की सुनिश्चितता प्रदान करना।
• शिक्षा और अनुसंधान के महत्वपूर्ण क्षेत्र में नीतिगत समर्थन को बढ़ावा देकर, परीक्षण सीखने की सुविधा जुटाना ताकि छात्रों को ज्ञान, कौशल और व्यवहार संतुलित सम्मिश्रण मुहैया किया जा सके, और मांग आधारित भागीदारी और संबंधों के जरिये कृषि विश्वविद्यालयों में कार्यकुशलता और परिदृश्य को बढ़ाना।
• राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में चेयर/पद के जरिये नेशनल प्रोफेसर, नेशनल फैलो, एमरिट्स वैज्ञानिक योजनाएं और छात्रों को स्कॉलरशिप और फैलोशिप के जरिये पुरस्कार और उत्कृष्ट अध्यापक पुरस्कार आदि द्वारा उत्कृष्टता और विशेषज्ञता को बढ़ावा देना।
• राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पद्धति (नार्स) का क्षमता निर्माण करना इसमें नार्म और क्षमता निर्माण हेतु राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संबंध बनाना है।

उपलब्धियां
• कृषि शिक्षा में गुणवत्ता सुनिश्चितता हेतु प्रत्यायन मंडल की स्थापना की और 22 कृषि विश्वविद्यालयों का प्रत्यायन किया।
• कृषि विश्वविद्यालयों में विशेष क्षेत्रों में नीतिगत सुदृढ़ता बढ़ाने हेतु 28 उत्कृष्टता के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को स्वीकृति प्रदान की गयी इसमें नयी और मौजूदा महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियां शामिल हैं।
• स्नातक स्तर पर छात्रों को कौशल उन्मुख हस्त प्रशिक्षण देने के लिए सभी विश्वविद्यालयों में परीक्षण ज्ञान की 200 ईकाइयां स्थापित की गयीं हैं।
• शैक्षिक सुविधाओं, ढांचागत सुविधाओं और संकाय सुधार को अद्यतन और सुदृढ़ बनाने के लिए राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, केन्द्रीय विश्वविद्यालयों और समतुल्य विश्वविद्यालयों को नियमित वित्तीय और प्रोफेशनल समर्थन दिया गया।
• स्नातक स्तर पर कृषि विश्वविद्यालयों में लागू करने के लिए संशोधित पाठ्यक्रम को स्वीकृति प्रदान की गयी। इसमें कौशल निर्माण हेतु हस्त प्रशिक्षण और परीक्षण द्वारा सीखना शामिल हैं। इसे परिषद द्वारा गठित चौथी डीन समिति द्वारा संस्तुति प्रदान की गयी है।
• छात्राओं को बढ़ावा देने के लिए राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में बालिका छात्रावास के निर्माण हेतु वित्तीय सहायता प्रदान की गयी। प्रत्येक विश्वविद्यालय में एक बालिका छात्रावास की सुविधा प्रदान की गयी है।
• राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्रों को शिक्षा देने के लिए 12 अन्तर्राष्ट्रीय छात्रावासों के निर्माण हेतु समर्थन दिया गया।
• वित्तीय सहायता प्रदान करके स्नातक स्तर पर ग्रामीण जागरुकता कार्य अनुभव को बढ़ावा दिया गया।
• शिक्षा में गुणवत्ता सुधार और अन्तः प्रजनन में कमी लाने के लिए छात्रों के दाखिले के लिए नियमित परीक्षाओं का आयोजन किया गया। स्नातक स्तर पर 15% और स्नातकोत्तर स्तर पर 25% सीटों के लिए यह परीक्षा आयोजित की गयी। प्रति वर्ष लगभग 1350 मेधावी छात्रों का स्नातक कार्यक्रम में और 1600 छात्रों का स्नातकोत्तर कार्यक्रम में दाखिला होता है।
• प्रति वर्ष महत्वपूर्ण क्षेत्रों में 90 ग्रीष्म/शीत विद्यालयों के जरिए लगभग 2400 वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण दिया जाता है।
• मानव संसाधन विकास, राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने और अन्तःप्रजनन को रोकने के लिए प्रति वर्ष स्नातक अध्ययन में 100 राष्ट्रीय मेधावी छात्रवृतियां, 275 कनिष्ठ अनुसंधान फैलोशिप स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए और पी एच डी के लिए 200 वरिष्ठ अनुसंधान फैलोशिप प्रदान की जाती हैं।
• एडवांस अध्ययन के 31 केन्द्रों द्वारा संकाय क्षमता में सुधार किया गया।
• विदेशी छात्रों को अवसर देकर विकासशील देशों में भारतीय उच्च कृषि शिक्षा को बढ़ावा दिया गया।
• कृषि विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों को अद्यतन किया गया और इसमें साहित्य तक ऑन लाइन पहुंच के लिए नेटवर्क शामिल है।
• भा.कृ.अनु.प. राष्ट्रीय प्रोफेसर और राष्ट्रीय फैलो योजनाओं के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्टता को बढ़ावा दिया गया।
• दसवीं योजना में विशेष क्षेत्रों में अनुसंधान के लिए 100 उत्कृष्ट सेवामुक्त वैज्ञानिकों को भा.कृ.अनु.प. अवकाश वैज्ञानिक पुरस्कार प्रदान किया गया।
• सर्वश्रेष्ठ अध्यापक पुरस्कार द्वारा विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट अध्यापकों की पहचान की गयी।
• सक्षम संकाय को शामिल करके विश्वविद्यालय स्तरीय पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन किया गया और ई-पाठ्य पुस्तकों और ई-सारांश को भी प्रोत्साहन दिया गया।
• नार्म द्वारा राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पद्धति (नार्स) में आवश्यकता आधारित क्षमता निर्माण विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए किया गया इसमें फाउंडेशन कोर्स, रेफ्रेशर कोर्स, वर्कशाप और सेमिनार तथा अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम शामिल हैं। इसके अलावा नार्स के प्रदर्शन को बढ़ावा देने और भा.कृ.अनु.प. कार्यक्रमों की समीक्षा के लिए नीतिगत समर्थन भी प्रदान किया।
• अकाई के तहत सहयोग के 4 प्रमुख क्षेत्रों- (1) मानव संसाधन और संस्थागत क्षमता निर्माण (2) कृषि प्रसंस्करण और विपणन (3) उभरती प्रौद्योगिकी और (4) प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन के तहत सहयोगी अनुसंधान परियोजनाएं शुरू की गयी हैं। नॉर्मन बॉरलाग फैलोशिप और कोचरन फैलोशिप यू एस ए में प्रशिक्षण के लिए प्रदान की गयी और भारत एवं यूएसए में संयुक्त कार्यशालाओं का भी आयोजन किया गया।

सम्पर्क
डा. अरविन्द कुमार, उपमहानिदेशक (शिक्षा)
शिक्षा संभाग, कृषि अनुसंधान भवन-II
नई दिल्ली-110 012 भारत
फोनः 91-11-25841760
फैक्सः 91-11-25843932
ई-मेलः ddgedn@icar.org.in

बागवानी संभाग
भा.कृ.अनु.प. का बागवानी संभाग 10 राष्ट्रीय संस्थानों, 7 राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्रों और 13 अखिल भारतीय समन्वित परियोजनाओं के जरिए बागवानी अनुसंधान का कार्य करता है। यह 7 नेटवर्क अनुसंधान कार्यक्रमों का भी समन्वयन करता है जिनमें रिवाल्विंग फंड स्कीम और अन्य बाह्य वित्त पोषित परियोजनाएं शामिल हैं। इस संभाग का मुख्यालय कृषि अनुसंधान भवन- II, पूसा कैम्पस, नई दिल्ली है। इस संभाग के 2 वस्तु/विषय विशेष तकनीकी अनुभाग (बागवानी 1 और 2) और एक प्रशासकीय विंग, संस्थान प्रशासन -V हैं। उपमहानिदेशक (बागवानी) को तकनीकी और प्रशासकीय प्रबन्धन में 2 सहायक महानिदेशक और एक उपसचिव (बागवानी) सहायता करते हैं।

महत्वपूर्ण क्षेत्र
देश के कई राज्यों में आर्थिक विकास हेतु बागवानी (फल, गिरीदार फल, सब्जियां-आलू, कंदीय और मशरूम, सजावटी पौधे-कट फ्लावर, मसाले, रोपण फसलें आदि) प्रमुख है और कृषि के सकल घरेलू उत्पादन में इसका योगदान 29.5 प्रतिशत है। यहां प्रौद्योगिकी आधारित विकास की आवश्यकता है और बागवानी संभाग की इस संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका है। अनुसंधान प्रमुखताएं हैं- अनुसंधान संसाधन बढ़ोतरी और उपयोग, उत्पादन दक्षता बढ़ाना और पर्यावरण मैत्री तरीके से नुकसान को कम करना।
अनुसंधान प्रमुखताएं इस प्रकार हैं-
• उन्नत किस्मों का दक्ष प्रबन्धन, बढ़ोतरी, मूल्यांकन और आनुवंशिक संसाधन और विकास, उच्च गुणवत्ता लक्षण, उत्पादन, कीटनाशी और रोग प्रतिरोधिता और अजैविक दबावों के प्रति सहिष्णुता।
• किस्मों के विकास की प्रजनन दक्षता में सुधार हेतु प्रौद्योगिकियों का विकास जो कि बाजार की आवश्यकतानुरूप हो जैसे स्वाद, ताजापन, स्वास्थ्य लाभ और सुविधा के साथ ही जैविक और अजैविक दबावों के प्रति सहिष्णु हो।
• विभिन्न बागवानी फसलों के लिए विकास और स्थान विशेष प्रौद्योगिकी के जरिए उत्पादन विभिन्नता में कमी लाकर, गुणवत्ता, फसल नुकसान में कमी और विपणन बढ़ाकर उत्पादन का मूल्य बढ़ाना।
• पोषक तत्वों, जल के उत्पादक उपयोग को विकसित करना और नवोन्मेषी नैदानिक प्रौद्योगिकियों के प्रयोग से कीटनाशियों और रोगों के दुष्प्रभाव को कम करना।
• ऐसी उत्पादन पद्धति का विकास करना जिससे उत्पादन अवशेष कम हो और इन अवशेषों का अधिकतम पुनः उपयोग हो सके।
• बेहतर लाभ के लिए फलों, सब्जियों, फूलों की शेल्फ लाइफ बढ़ाना, उत्पाद विविधता और मूल्य संवर्धन।
• समुदाय की सामाजिक जरूरतों को समझना और बदलाव हेतु क्षमता निर्माण करना, संसाधनों का दक्ष उपयोग और प्रौद्योगिकियों को अपनाना तथा जैव-सुरक्षा आवश्यकता आदि जरूरतों हेतु कार्य करना।

उपलब्धियां
• गहन अनुसंधान के फलस्वरूप शुरूआत से ही भारत ताजा फलों और सब्जियों का विश्व में द्वितीय सबसे ज्यादा उत्पादक देश है और मसालों और काजू का सबसे बड़ा निर्यातक देश है।
• आनुवंशिक संसाधनों में फलों की 2194 प्रवष्टियां, सब्जियों की 11,229 प्रवष्टियां, कंदीय फसलों की 10,184 प्रविष्टियां, मसालों की 6336 प्रविष्टियां, रोपण फसलों की 1304 प्रविष्टियां, औषधीय और सगंधीय पौधों की 1327 प्रविष्टियां जननद्रव्य संग्रहण में शामिल हैं।
• बागवानी की कुल 672 उच्च उत्पादक किस्मों और संकरों का विकास किया गया है (फल-17, सब्जियां 488, कंदीय फसलें 47, रोपण फसलें 49, सगंधीय और औषधीय पादप 36, सजावटी 39 और मशरूम 5) इसके परिणामस्वरूप केला, आलू, कसावा, इलायची, अदरक, हल्दी आदि बागवानी फसलों की उत्पादकता बढ़ी है।
• नींबू, केला, आलू, कसावा और शकरकंद के लिए रोगमुक्त अच्छी गुणवत्ता की रोपण सामग्री के उत्पादन हेतु उन्नत तकनीकें विकसित की गयी हैं। विभिन्न फलों, मसालों और अन्य कायिक प्रवर्धन पौधों के लिए सूक्ष्म उत्पादक तकनीकों का मानकीकरण किया गया है।
• अंगूर में सूखा और लवणता सहिष्णुता के लिए मूलकांड (डागरिज और IIOR) की पहचान की गयी है। नींबूवर्गीय, सेब और आम के मूलकांड की भी पहचान की गयी है।
• अमरूद में चारागाह बाग लगाने उच्च घनत्व रोपण, छत्र प्रबन्धन की प्रौद्योगिकी विकसित की गयी है। और पुराने तथा जीर्णशीर्ण आम और अमरूद के बागों के पुर्नुद्वार की प्रौद्योगिकी विकसित की गयी है।
• बागवानी फसलों हेतु सूक्ष्म सिंचाई और उर्वरक देकर जल और पोषण दक्षता को बढ़ाने की प्रौद्योगिकी विकसित की गयी है।
• नारियल और सुपारी में उत्पादकता बढ़ाने के लिए अन्तर फसली और बहुफसली प्रणाली मॉडल का विकास किया गया है।
• औषधीय पौधों जैसे सफेद मूसली, नींबू घास, पायरोसा, सेना आदि के लिए अच्छी कृषि क्रियाएं विकसित की गयी हैं।
• उच्च उत्पादक ओयस्टर और नीली ओयस्टर मशरूम किस्में और इनकी उत्पादन प्रौद्योगिकी का मानकीकरण किया गया है।
• विषाक्त कीटनाशियों पर निर्भरता कम करने के लिए पर्यावरण हितैषी जैवकारक जैसे ट्राइकोग्रामा, एन पी वी, पेसिलोमाइसिस आदि का विकास किया गया है। ट्राइकोडर्मा एन.वी.पी. थियोरेसेन्स, एस्परजील्स आदि के दक्ष प्रभेदों का विगलन किया गया और बागवानी फसलों में मृदा जनित रोगकारकों जैसे फ्यूजेरियम, रिजोक्टोरियास, पाइथियम, फाइटोफ्थोरा और पादप परजीवी सूत्रकृमियों के प्रबन्धन के लिए इन्हें सूचीबद्ध किया गया।
• विषाणु, बैक्टीरिया, फफूंदी और सूत्रकृमि की जांच के लिए सेरोलोजिकल और पी सी आर आधारित निदान विकसित किये गये।
• शंकरकंद घुन पर नियंत्रण के लिए दक्ष सेक्स फेरामोन सेप्टा का विकास किया गया।
• फार्म मशीनीकरण को तुड़ाई और प्रसंस्करण दक्षता बढ़ाने और फसल नुकसान को कम करने के लिए लागू किया गया है। इसके लिए हारवेस्टर, ग्रेडिंग और कटाई मशीन, ड्रायर, छंटाई यंत्र आदि विकसित किये गये हैं।
• फलों और सब्जियों के फार्म पर भंडारण हेतु एक कम कीमत के पर्यावरण हितैषी कूल चैम्बर का विकास किया गया है।
• आलू, अंगूर और मसालों में जर्मप्लाज़्म संसाधनों, कीटों और रोगों पर डाटाबेस, सूचना और विशेषज्ञ पद्धति का विकास किया गया है।
• नारियल, आम, अमरूद, आंवला, लीची और विभिन्न सब्जियों, आलू, कंदीय फसलें, मशरूम आदि में असंख्य मूल्य वर्द्धित उत्पादों का विकास किया गया है।

संपर्क
डा. एच.पी. सिंह
उपमहानिदेशक (बागवानी)
बागवानी संभाग, कृषि अनुसंधान भवन II, नई दिल्ली 110 012 भारत
फोनः 91-11-25851068, 91-11-25842284/85/62/70/71 एक्स 1422
ई-मेलः hpsingh@icar.org.in

कृषि विस्तार संभाग
कृषि विस्तार संभाग की प्रमुख गतिविधियों में कृषि विज्ञान केन्द्रों के जरिए प्रौद्योगिकी में मूल्यांकन, सुधार और प्रदर्शन करना है। भा.कृ.अनु.प. संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के तहत 44 कृषि प्रौद्योगिकी सूचना केन्द्रों की स्थापना की गयी है। कृषि में महिलाओं हेतु राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र, भुवनेश्वर, उड़ीसा में स्थित है। उप महानिदेशक (कृषि विस्तार) इसके प्रमुख हैं और इनकी सहायता के लिए 2 सहायक महानिदेशक हैं।

महत्वपूर्ण क्षेत्र
• प्रौद्योगिकी/उत्पादों का मूल्यांकन, सुधार और प्रदर्शन
• कृषकों को प्रशिक्षण
• विस्तार कर्मियों को प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण
• कृषि प्रौद्योगिकी सूचना केन्द्रों के जरिए प्रौद्योगिकी उत्पादों/नैदानिक सेवाओं और सूचना हेतु सिंगल विंडो डिलीवरी
• लिंग विशेष प्रौद्योगिकी का विकास
• कृषकों में उन्नत कृषि प्रौद्योगिकियों हेतु जागरुकता फैलाना।

उपलब्धियां
• 569 से ज्यादा कृषि विज्ञान केन्द्रों का नेटवर्क तैयार
• विभिन्न कृषि पद्धतियों के तहत 4189 खेतों पर 537 प्रौद्योगिकियों के परीक्षण कर स्थान विशेषता की पहचान करना
• कृषकों के खेतों पर नई जारी उत्पादन प्रौद्योगिकियों की उत्पादन क्षमता के प्रदर्शन के लिए 53,974 प्रथम पंक्ति प्रदर्शनों का आयोजन किया गया।
• कृषि और संबंध क्षेत्रों में 10 लाख से ज्यादा कृषकों और कृषि विस्तार कर्मियों को प्रशिक्षण दिया गया।
• लगभग 4.19 मिलियन किसानों और अन्य उपभोगियों के लाभ हेतु असंख्य विस्तार गतिविधियां सम्पन्न की गयीं।
• किसानों की उपलब्धता हेतु 82,000 ‌‌‌क्व‌िं से ज्यादा बीज और 10.2 मिलियन/पौद/पौध/ पशुधन प्रजातियों का उत्पादन विभिन्न जैव उत्पादों के अलावा किया गया।
• राष्ट्रीय कृषक महिला अनुसंधान केन्द्र में कृषि लिंग संबंधी मुद्दों की पहचान की गयी।
• भा.कृ.अनु.प. संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में 44 कृषि प्रौद्योगिकी सूचना केन्द्रों का कार्य जारी रहा।
• जिला स्तर पर वैज्ञानिकों और विकास अधिकारियों को शामिल करके 334 अन्तरामुख बैठकें आयोजित की गयीं।
सम्पर्क
डा. के.डी. कोकाटे, उप महानिदेशक
कृषि विस्तार संभाग, कृषि अनुसंधान भवन, नई दिल्ली 110 012
फोनः 91-11-25843277
फैक्सः 91-11-25842968
ई-मेलः kdkokate@icar.org.in

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